Friday, 14 September 2018

मौत के मकां

मौत के मकां, खूब हैं यहां
देख लो देख लो खूब गौर से
आ रहे लोग यहां दूर दूर से
न है किसी को पता न किसी को खबर
कितनी रेत डाली है कितनी छोड़ी डगर
बिल्डर ने सारे नियम तोड़ डाले हैं
सीमेंट सरिया हल्की डाली, कच्चे ईंट डाले हैंमौत के मकां, poem
हम गए हम गए तुम भी पहुंच गए
बातों में आके बिल्डर को नोट दे दिए
सोच न सके कुछ भी सोच न सके
हमने एक लिया प्लॉट तुमने दो लिये

प्लॉट के नाम पे फ्लैट दे दिया 
बुरे फंसे बुरे फंसे हमको ठग लिया
मन मसोसकर फिर रहने चले गए
मकां सजा दिए पूजा भी कर दिए
रह रहे थे हम तो खूब शान से
अपने अपने घर में जो आलीशान थे
फिर नज़र लगी किसी कि दिन काला हो गया
जोर का शोर हुआ और गुबार छा गया
चारों ओर चारों ओर हर कोई रो पड़ा
आलीशां आलीशां मकां मेरा ढह गया

मौत आई मौत आई रूह कांप गई
गृहस्थी उजड़ गई ज़िन्दगी बिखर गई
भीड़ आई लोग आए जमघट भी लग गया
देखते देखते सपना वो थम गया
कुछ मरे कुछ दबे कुछ मिले भी नहीं
देखिए आज तो रोशनी भी काली हो गई
सब बिलख बिलख गये मुलाज़िम आ गया
पांच पांच लाख का ऐलान कर गया
मौत सस्ती देख के दिल ये रो गया
हाय हाय हाय क्या से क्या हो गया
जान गई माल गया वज़ूद भी चला गया
वो देखो वो देखो बिल्डर तो हंस रहा।


- रिज़वान नूर खान

Thursday, 13 September 2018

मुर्गे की दावत


गांव के बदलते स्वरूप को आलेख रूपी छोटी-छोटी यादों को समेटे रामधारी सिंह दिवाकर की 'जहां आपनो गांव' किताब हाल ही में साहित्य संसद प्रकाशन दिल्ली से छपकर आई है। किताब में बिहार के अररिया ज़िलें के गांवों का ज़िक्र किया गया है। वहां के हालातों, मजदूरों की मुश्किलों और उनके आधुनिक होने के साथ ही गांव-देहात की अच्छी-बुरी बातों का वर्णन है।

लेखक ने किताब की दूसरी कहानी में हनीफ चाचा को केंद्र में रखा है। हनीफ बुजुर्ग हैं, उनका कोई पक्का रोजगार नहीं है। एक तरह से मजदूर ही हैं। करीब तीन बीवियां और 18 बच्चों का कुनबा है। इसके अलावा कई मुर्गियां और बकरियां हैं। परिवार की जीविका मुश्किल से चलती है। मुर्गे-बकरियों की वजह से आये-दिन पड़ोसियों से कहासुनी होती है। कई बार मारपीट और ख़ूनमखून भी हो चुका है। जबकि कई लोगों से उनकी अच्छी पटती भी है।

हनीफ चाचा का मुर्गा सुबह से नहीं मिल रहा, अब शाम हो गई है। हनीफ और बाकी लोग जानते हैं कि मुर्गा पड़ोसी बनिये ने खुंदक निकलने के लिए पकड़कर छुपा लिया है। हितैषियों के कहने पर हनीफ चाचा थाने में शिकायत करने पहुंचे हैं। दरोगा ने चाचा को सुना, तम्बाकू थूकी और लार टपकाती आंखों से इशारा कर रुपये मांगे। चाचा बनिये को पिटवाना और मुर्गे को वापस पाना चाहते हैं तो कुर्ते की जेब से 20 का नोट निकालकर दे दिया।

बनिये को थाने में दांत-डपट के बाद चार-छै डंडे पड़े तो मुर्गा लाकर दरोगा को सौंप दिया। हनीफ चाचा को अब तसल्ली है। बनिये की बेइज्जती हो गई। थाने से छोड़ने के नाम पर दरोगा और दलालों को जेबें भी गरम हो गईं। तमाशा देखने वालों का मनोरंजन हो गया। हनीफ चाचा मुर्गा लेकर जाने लगे तो दरोगा ने घुड़क दिया और उसे काट-छीलकर लाने को कहा। शाम को थाने में मुर्गे की दावत उड़ी।

इस लड़ाई में न हनीफ चाचा को कुछ हासिल हुआ और न बनिये को कुछ मिला। बल्कि दूसरे-तीसरे लोग मलाई काट गए। करीब दो दशक पुरानी इस घटना ने आज और विस्तार पा लिया है। घूसखोरी और एक-दूसरे से जलने-कुढ़ने की आदत का कैनवास पहले कहीं ज्यादा बड़ा हो गया है।

लेखक रामधारी सिंह दिवाकर कई किताबें, कहानियां लिख चुके हैं। अररिया ज़िले के नरपतगंज गांव के रहने वाले हैं। मिथिला विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष पद से रिटायर हैं। उनकी यह किताब अभी पूरी पढ़ी नहीं है। पढ़ रहा हूं पर अभी तक जितनी पढ़ी है उससे कह सकता हूं कि किताब 'जहां आपनो गांव' में संकलित संस्मरण अच्छे हैं। इसे पढ़ा जाना चाहिए।

Sunday, 10 June 2018

बुंदेलखंड का सूखा

बुंदेलखंड हमेशा से कम बारिश वाला इलाका रहा है, लेकिन 2002 से लगातार सूखे ने मर्ज़ को तकरीबन लाइलाज बना दिया है.यह जमीनी बताती है कि बुंदेलखंड को ईमानदार कोशिशों की ज़रूरत है. साफ-सुथरी सरकारी मशीनरी अगर आम लोगों को साथ लेकर कोशिश करे तो सूखता जा रहा बुंदेलखंड शायद फिर जी उठे।


दिल्ली के पास वैशाली में तकरीबन नियमित रूप से एक रिक्शेवालेचेतराम से मेरी मुलाकात होती है जो अमूमन सफ़ेद कमीज़ और पाजामे में होता है। वही चेतराम मुझे एक रोज़ अपने घर के असबाब के साथ सड़क पर खड़ा मिल गया। उसकी झुग्गी उजाड़ दी गई थी। आनंद विहार, दिल्ली की सरहद है और एक सड़क इस केंद्रशासित प्रदेश को उत्तर प्रदेश से अलग करती है। इसी सड़क से थोड़ा और आगे जाएंगे तो वैशाली और इंदिरापुरम जैसी पॉशकॉलोनियां हैं।

वैशाली में, जहां मैं रहता हूं, आसपास अभी अनगिनत खाली प्लॉट हैं, जिनपर न जाने कितने लोग झुग्गियां बनाकर रहते हैं। वहां महागुनमेट्रो और शॉप्रिक्स जैसे चमचमाते मॉल्स हैं, जहां की दुनिया में पॉपकॉर्न जैसी चीज़ें मक्खन के साथ खाई जाती हैं, उससे थोड़ा आगे ही करोड़ों की कीमत वाले खाली प्लॉट्स पर झुग्गियों में न जाने कितनी ज़िंदगियां अपने अरबों-खरबों के सपनों को जीने लिए जाने कहां-कहां से आती हैं।

चेतराम भी उन्हीं में से एक हैं, जो उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड से पलायन करने को मजबूर हुए हैं। बिरादरी से दलित चेतराम पेट पालने के चक्कर में घर छोड़कर यहां किसी और की ज़मीन पर रहते हैं, जहां उनकी झुग्गी अवैध और गंदी बस्ती के रूप में गिनी जाती है।

ऐसी ही किसी गिनती को कम करने के लिए गाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण ने सभी खाली प्लॉटवालों को अपने प्लॉट पर निर्माण कार्य शुरू कराने का आदेश दिया, ऐसा न करने पर आवंटन रद्द कर दिया जाता। इसीलिए, चेतराम की झुग्गी उजाड़ दी गई। झुग्गी ही नहीं उजड़ी, उनका घर और उनकी दुनिया भी उजड़ गई। अब चेतराम और उसके गांव के उसके ही जैसे लोग, मकनपुर गांव में रहते हैं। वहां भी वो किसी खाली ज़मीन पर ही रहते हैं, जहां रोज़मर्रा की दिक्कतें हैं। पानी की, शौच की, सफ़ाई की, हर क़िस्म की दिक़्क़त।

चेतराम, बुंदेलखंड के अपने गांव गन्हौली से निकले तो अपने पीछे सात बीघा ज़मीन छोड़कर आए थे। वे बड़े शान से बताते हैं कि उनका इलाका बेमिसाल राजाओं का इलाक़ा रहा है। राजा परमार देव का ज़िक्र करते हुए चेतराम कहते हैं-बड़े लड़इयामहुबे वाले, इनकी मार सही न जाए। ठीक है कि इतिहास में महोबे के वीरों की मार बहुत भारी थी और उन्हें हराना कठिन था लेकिन आज की तारीख़ में पानी ने सबको त्रस्त करके रख दिया है।

चेतराम के इलाक़े में एक के बाद कई एक बरसों तक नियमति बारिश नहीं होने से खेती फ़ायदे का सौदा नहीं रह गया। सात बीघा ज़मीन को बटाई पर लगाकर, काम की तलाश में चेतराम सपरिवार दिल्ली आ गए। बटाई वाली ज़मीन से कुछ मिलता नहीं। दिल्ली में वे ख़ून-पसीना बहाते हुए रिक्शा चलाते हैं। लेकिन उनकी आंखों में गांव वापस जाने का सपना और उम्मीद भी ज़िंदा है।

केन नदी के किनारे ज़िंदगी उम्मीद के सहारे आगे बढ़ती है। शायद इसी ने ज़िंदा रखा था, गढ़ा गांव के प्रह्लाद सिंह को। बड़ी-बड़ी शानदार मूंछों वाले प्रह्लाद सिंह ने अपनी जवानी में किसी का क़त्ल कर दिया था। क़त्ल का जुर्म अदालत में साबित हो गया, 1962 में बांदा ज़िला अदालत ने उन्हें सज़ा-ए-मौत सुनाई। लेकिन, प्रह्लाद सिंह को राष्ट्रपति से जीवनदान मिला और उनकी सज़ा आजीवन कारावास में बदल दी गई।

प्रह्लाद सिंह ने दस साल जेल में काटे थे कि सन बहत्तर में नेकचलनी की वजह से उन्हें वक़्त से पहले रिहा कर दिया गया। प्रह्लाद, गांव लौटे तो नई उम्मीद के साथ ज़िंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश की। गृहस्थी की गाड़ी चल निकली। 

अभी एक दशक पहले तक सब कुछ ठीक-ठाक था। लेकिन परिवार बड़ा हुआ तो प्रह्लाद सिंह और उनके भाई ने मिलकर ट्रैक्टर के लिए बैंक से कर्ज़ ले लिया। इसी कर्ज़ ने उनके परिवार को बरबाद कर दिया। साल 2002 के बाद बुंदेलखंड का पूरा इलाक़ा लगातार सूखे की गिरफ़्त में आता गया। यह इलाक़ा पहले से ही कम बारिश वाला रहा है, लेकिन लगातार सूखे ने मर्ज़ को तकरीबन लाइलाज बना दिया। प्रह्लाद सिंह की खेती चौपट हो गई। आमदनी का ज़रिया जाता रहा। बैंकों को कर्ज़ दिए गए पैसे वापस चाहिए थे। 

यह बात और है कि यह बैंक सरकारी थे और इस देश में विजय माल्या जैसे कई उद्योगपति हैं जिन्होंने इन्हीं सरकारी बैंकों का पैसा दबा रखा है, और चुकाने के वक्त विदेश चले गए। यह बात भी और है कि देश के 6 हज़ार उद्योगपतियों ने बैंकों से सवा लाख करोड़ का कर्ज़ ले रखा है। उनमें से कोई आत्महत्या नहीं करता, न ही उन पैसों के लिए बैंक कभी हलकान होता है और उनके घर भाड़े के गुंडे भेजता है।

लेकिन गढ़ा गांव के किसान प्रह्लाद सिंह के घर बैंक ने भाड़े के गुंडे भेज दिए। वह साल 2007 था, जब किराए के गुंडों ने बैंक की तरफ़ से प्रह्लाद सिंह के ट्रैक्टर को कब्ज़े में ले लिया। ट्रैक्टर नीलाम कर दिया गया और उसके बाद बची बाक़ी की रकम की देनदारी की आख़िरी नोटिस भी निकाल दी गई।

जिन लोगों ने भारत के किसानों को ज़रा नज़दीक से देखा होगा, उन्हें इस बात का अंदाज़ा होगा कि एक किसान के लिए कितनी अहम होती है, उसकी साख, उसकी इज़्ज़त। खेत सूखे थे, कमाई का एक ज़रिया ट्रैक्टर था, वह भी चला गया। पहले तो प्रह्लाद सिंह के परेशान भाई और फिर उनके बेटे, बच्ची सिंह ने आत्महत्या कर ली। सयानी हो रही पोती मनोरमा चाहती थी कि वह अपने दादा को ब्याह के खर्च से बचाए। मनोरमा भी एक दिन डाई (बालों में लगाने वाला रंग) पीकर हमेशा के लिए सो गई। दिवंगत बेटे और पोती की तस्वीर दिखाते प्रह्लाद सिंह कहते हैं कि उन्होंने राष्ट्रपति से ऐसे बुढ़ापे के लिए क्षमादान नहीं मांगा था।

बुंदेलखंड का एक ख़ुद्दार किसान, कर्ज़ चुकाना तो चाहता है लेकिन प्रह्लाद सिंह जैसे किसानों की मजबूरी है कि जिस खेती पर उन्होंने अपनी ज़िंदगी गुज़ार दी, वह खेती आज उनके बीज तक वापस नहीं कर पा रही।  प्रह्लाद सिंह की यह कहानी पूरे बुंदेलखंड की सवा दो करोड़ की आबादी की कहानी से कमोबेश मिलती-जुलती है। प्रह्लाद सिंह की ही तरह बाक़ी लोगों की उम्मीदों की डोर टूटने लगी है। कर्ज़ एक तरह से गांव के लोगों के लिए जीने की शर्त बन गए हैं। लेकिन, ये शर्त जानलेवा है।
साभार- मंजीत ठाकुर की किताब 'बुंदेलखंड: बूंद चली पाताल' से।

Sunday, 24 May 2015

तेरे गुम होने का दर्द


तेरे गुम होने का दर्द


क्या आपका अभी तक कुछ गुम हुआ है? फॉर एग्जांपल, दिल, पैसे, मोबाइल, मार्कशीट या रूम, अलमारी, ऑफिस, ड्रॉर की चाबी। और इनमें से किसके गुम होने का सबसे ज्यादा अफसोस हुआ या होता है?
यही सवाल मैनें अपने एक मित्र महोदय से किया। आंसर के तौर पर वे तपाक से बोले दिल गुम हुआ है, जो आज तक नहीं मि
ला। मैंने टेढ़ी निगाह से महोदय को घूरा और बोला अमां मियां जब दिल गुम हो चुका है तो तुम्हारे शरीर में जान क्यों बाकी है? खून पंप होना बंद क्यों नहीं हुआ? तुम मरे क्यों नहीं? अब मित्र महोदय की बोलती बंद, सें‌टियाने लगे।

मैं जान गया, दिल कहीं गुम नहीं होता, हम जबरदस्ती खुद को उसके गुम होने का अहसास कराते हैं, लेकिन आखिर तक वह अहसास हमें होता नहीं। क्योंकि वो सच नहीं होता।

मेरे एक और मित्र महोदय हैं, मैनें भी उनसे यही सवाल दागा। वे काफी रोनी सूरत में बोले भाईजान काफी दिन पहले मेरे पचास हजार रुपए गुम हुए हैं, जो आज तक नहीं मिले। महोदय के हाथ में एक लाल कलर की चमकीली बैग थी। मैंने पूछा इसमें क्या है? तो काफी ना-नुकु र के बाद बताया कि उसमें कुछ-एक लाख रुपए हैं। मैनें कहा, तो फिर गुम कहां हुए वो तो आपके पास ही हैं। बस दुगुने होने के लिए आपसे विदा हुए थ्ो।
कुछ देर मन मशक्कत करता रहा कि इतने में हमारे गंवइले चचा भिटा गए। अब मैनंे उनसे भी यही सवाल ठोंक दिया। वे तो जैसे ताव में आ गए, सांप की भांति फुंफकारते हुए बोले, अरे ससुरा हमरा मोबाइल गुम हुआ है। उसमें ससुर उस लौंडे का नंबर सेव किये रहे हम, जो हमरी बिटेना का मिस काल करके परेशान करत रहा। मैंने मन ही मन सोचा कि इनकी बिटेना तो कल ही गांव की बाजार वाली गली में पड़ोसी लौंडे से बतिया रही थी। खबर है दोनों का चक्कर भी चलता है।
मुझे सही जवाब मिलने की जगह, लोगों के गम की अलग-अलग वजहें मिलीं।
दरअसल कौन सी वस्तु के गुम होने से आपको दुख-अफसोस होगा। यह पूरी तरह आपकी कंडीशंस पर और उस वस्तु की इंपार्टेंस पर डिपेंड करता है।
कुछ ऐसे समझिए 'जरूरी कुछ भी नहीं और जरूरी सबकुछ है।’
कल शाम की ही बात है। आफिस से वापस आते समय रास्ते में कहीं मेरा चाबी का गुच्छा जेब को बिना इत्तिला किए या यूं मान लें कि उससे सांठ-गांठ साध कहीं सरक लिया। गुच्छा खुद तो गया ही अपने साथ आफिस ड्रॉर, रूम और अलमारी की चाबियों को भी बरगला ले गया।
अब मुझे अफसोस के साथ ग्लानि, तकलीफ और बेचैनी हो रही है। यह बेचैनी कब तक रहेगी? शायद आज रात तक, सुबह तक या पूरे दिन तक। लेकिन एक समय खत्म हो ही जाएगी। क्योंकि समय ही सब विपत्तियों और सुखों का जिम्मेदार होता है, और यह ‌िककिसी के लिए भ्‍ाी नहीं रुकता।

Friday, 1 August 2014

कई हजार ईसा पूर्व पैदा हुये अजूबे

विश्व के प्राचीन अजूबे


दुनिया बहुत सुन्दर है। प्रकृति ने अपने रंग से इस दुनियां को बहुत ही रंगीन बनाया है। समुद्र, पहाड़ और जमीन के मिलन से प्रकृति ने कुछ ऐसा नजारा हमारे लिए तैयार किया है जिसकी कल्पना करना इंसान के लिए कभी-कभी सपने जैसा हो जाता है। दुनिया में प्रकृति ने इतना रंग घोला है कि इंसान में भी इसे और सुन्दर बनाने की ललक पैदा हो गई। कभी अपनी याद के लिए तो कभी कला को समर्पण करने के लिए तो कभी किसी अन्य वजह से इंसान ने ऐसी कई रचनाएं की हैं जिनसे यह दुनिया और भी खूबसूरत बन गई है।
संसार में यूं तो इंसान द्बारा बनाई गई हजारों ऐसी कृतियां हैं जिन्हें देख आप अंचभे में पड़ जाएंगे लेकिन दुनिया के सात अजूबों की बात ही अलग है। अपनी शिल्प कला, वास्तु कला और भवन निर्माण कला के लिए दुनिया के सात अजूबे हमेशा चर्चा का विषय बने रहते हैं। आज बात कुछ प्राचीन एवं कई हजार ईसा पूर्व बूढ़े हो चुके अजूबों के बारे में।

 

मिस्र के पिरामिड 

मिस्र के पिरामिड दुनिया के प्राचीन सात अजूबों में एकमात्र सुरक्षित मिस्र के पिरामिडों का निर्माण आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व हुआ था। वास्तव में, ये पिरामिड मिस्र के शासकों के मकबरे हैं। सबसे बड़ा पिरामिड काहिरा से कुछ दूर गीजा कस्बे में स्थित है। यह राजा पैरोखूफू और उसकी रानी का मकबरा है। 481 फुट ऊंचे इस मकबरे के वर्गाकार आधार की प्रत्येक दीवार की लंबाई 75० फुट के लगभग है। इसमें बीस लाख से अधिक शिलाखंड हैं। माना जाता है कि दो हजार से भी अधिक मजदूरों ने बीस वर्षो तक कार्य करके इसे तैयार किया था।

मासोलस का मकबरा

संसार का तीसरा अजूबा हेलीकारनासस के शासक मासोलस का मकबरा था, जिसका निर्माण उसकी पत्नी ने करवाया था. यह लगभग सौ फुट ऊंचा था और उसके ऊपर घोड़े जुते रथ पर राजा-रानी की मूर्तियां थीं। निर्माण के कुछ ही दिनों बाद सकिदर महान के आक्रमण के कारण यह मकबरा ध्वस्त हो गया। राजा-रानी की मूर्तियां आज भी ब्रिटिश संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

देवी डायना का मंदिर

विश्व का चौथा अजूबा एफसेस में देवी डायना का मंदिर था। आठ फुट ऊंचे खम्भों पर टिके छत वाले इस मंदिर का निर्माण ईसा से साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व टर्की में हुआ था। इस समय यह मंदिर बहुत पवित्र माना जाता था। लोग इसमें अपना धन एवं कीमती वस्तुएं रखकर निश्चिंत हो जाते थे। 262 ई. में गोथ्स ने इस मंदिर को जला डाला था।

हीजियोस की कांस्य प्रतिमा

दुनिया का पांचवां अजूबा हीजियोस की कांस्य प्रतिमा थी। जो लगभग सौ फुट ऊंची थी। यह रोड्स द्बीप में थी। इसका निर्माण ईसा से 28० वर्ष पूर्व हुआ था। निर्माण के 56 वर्ष बाद यह प्रतिमा भूकंप में नष्ट हो गयी। जीयस देवता की मूर्ति संसार का छठा अजूबा ओलम्पिया में स्थित जीयस देवता की मूर्ति थी। इसे प्रसिद्ध शिल्पकार फीडिसस ने ईसा से साढ़े चार सौर वर्ष पूर्व बनाया था। चालीस फुट ऊंची इस मूर्ति के कपड़े सोने के थे। शरीर हाथी दांत का बना था। मूर्ति की आंखें कीमती हीरों से बनी थीं। इस मंदिर को ईसाइयों ने नष्ट कर दिया था।

फैरोह का प्रकाश स्तंभ 

दुनिया का सातवां अजूबा सकिदरिया के बंदरगाह के पास एक द्बीप पर बना फैरों का प्रकाश स्तम्भ था। सफेद संगमरमर से बना यह प्रकाश स्तंभ छह सौ फुट ऊंचा था। इसका निर्माण ईसा से 283 वर्ष पूर्व हुआ था। यह प्रकाश स्तंभ डेढ़ हजार वर्षों तक ठीक हालत में रहा, उसके बाद भूकंप में नष्ट हो गया।





 

Sunday, 13 April 2014

दुनिया का सबसे बड़ा होटल

दस हजार कमरों वाला दुनिया का सबसे बड़ा होटल

यूं तो पूरे विश्व में कई अजब-गजब इमारतें हैं, लेकिन जर्मनी में बाल्टिक सागर के आइलैंड में स्थित होटल प्रोरा अपने आप में एक अजूबा है। इस होटल में तकरीबन दस हजार कमरे हैं। इतने कमरों वाला होटल पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। आपको आश्चर्य होगा कि दुनिया का सबसे विशाल होटल पिछले 7० सालों से वीरान पड़ा है।
जर्मनी के नाजी शासन ने इस विशाल होटल दा प्रोरा का निर्माण 1936 से 1939 के बीच में करवाया था। इसे बनाने में 9,००० लेबरफोर्स को तीन साल लगे थे।
 
होटल प्रोरा में एक समान 8 बिल्डिंग बनाई गई हैं और हर बिल्डिंग की लंबाई 4.5 किलोमीटर है। यह बिल्डिंग समुद्र से बमुश्किल 15० मीटर दूर है। इसमें चार एक जैसे रिसॉर्ट थे, सभी में सिनेमा, फेस्टिवल हॉल और स्वीमिग पूल भी थे।
जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर का यह प्लान बहुत महत्वाकांक्षी था। वह एक घुमावदार सी रिसॉर्ट बनाना चाहता था, जो विश्व में सबसे विशाल हो। इस होटल के हर कमरे में दो बेड, एक अलमारी और एक सिक बनाया गया है। हर फ्लोर में टॉयलेट्स, शॉवर और सामूहिक बॉथरूम बनाए गए थे। बिल्डिंग के मध्य में यह व्यवस्था की गई थी कि युद्धकाल में इसे अस्पताल में बदला जा सके।
 
हिटलर का यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पूरा होता, इससे पहले ही द्बितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया। विश्वयुद्ध खत्म होने के बाद पूर्वी जर्मनी के विस्थापितों को इस होटल में रखा गया था। इसके बाद जर्मनी ने इसका उपयोग एक मिलिट्री पोस्ट के लिए किया।
आज भी यह बिल्डिंग काफी खूबसूरत लेकिन वीरान है। हालांकि इसके कुछ ब्लॉकों को छोड़कर बाकी खंडहर हो गए हैं। 


2०11 में इसके एक ब्लॉक में 4०० बिस्तरों वाला अस्पताल बनाया गया। अभी होटल प्रोरा को 3०० बिस्तरों वाले एक हॉलीडे रिसॉर्ट में बदलने की तैयारी चल रही है। इसमें नए सिरे से टेनिस कोर्ट, स्वीमिग पूल और शॉपिग सेंटर और हर वो चीज बनाई जानी प्रस्तावित है, जिससे यह अद्भुत स्थलों में शुमार हो सके।
 

Tuesday, 8 April 2014

बेल का खेल


बेल का अजब खेल

बेल का पेड़ विश्व के कई हिस्सों में पाया जाता है। भारत में इस वृक्ष का पीपल, नीम, आम और पलाश वृक्षों के समान ही बहुत अधिक सम्मान है। हिंदू धर्म में बेल का वृक्ष भगवान शिव की अराधना का मुख्य अंग है। बेल की तासीर बहुत शीतल होती है। गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी होता है। इसके फल व पत्तियों मंे टैनिन, आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं।
मान्यता है कि शिव को बेल-पत्र चढ़ाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। बिल्व के पेड़ का भी विशिष्ट धार्मिक महत्व है। कहते हैं कि इस पेड़ को सींचने से सब तीर्थों का फल और शिवलोक की प्राप्ति होती है।
बेल का वृक्ष यूं तो पूरे भारत में पाया जाता है लेकिन विशेष रूप से हिमालय की तराई, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों में चार हजार फीट की ऊंचाई तक यह पाया जाता है। मध्य व दक्षिण भारत में बेल वृक्ष जंगल के रूप में फैले हुए हैं और बड़ी संख्या में उगते हैं। यह भारत के अलावा दक्षिणी नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया एवं थाईलैंड में उगते हैं। इसकी खेती भारत के साथ श्रीलंका, उत्तरी मलय प्रायद्बीप, जावा एवं फिलीपींस तथा फीजी द्बीपसमूह में भी की जाती है।
 
यह पंद्रह से तीस फुट ऊं चा होता है। इसका कड़ा और चिकना फल कवच कच्ची अवस्था में हरे रंग और पकने पर सुनहरे पीले रंग का हो जाता है। कवच तोड़ने पर पीले रंग का सुगंधित मीठा गूदा निकलता है, जो खाने और शर्बत बनाने के काम आता है।

आयुर्वेद में बेल वृक्ष को कई प्रकार से लाभकारी बताया गया है। इसके पत्तों, फलों को औषधि के रूप में बहुत प्रयोग किया जाता है। बेल की जड़ों की छाल का काढ़ा मलेरिया व अन्य बुखारों में हितकर होता है। अजीर्ण में बेल की पत्तियों का रस काली मिर्च और सेंधा नमक में मिलाकर पीने से आराम मिलता है। अतिसार के पतले दस्तों में ठंडे पानी से इसका चूर्ण लेने पर आराम होता है। आंखें दुखने पर बेल के पत्तों का रस, स्वच्छ पतले वस्त्र से छानकर एक-दो बूंद आंखों में टपकाने से समस्या से निजात मिलती है। शरीर की त्वचा के जलने पर बेल के चूर्ण को गरम कर तेल में मिलाकर जले अंग पर लगाने से आराम मिलता है।