Sunday, 24 May 2015

तेरे गुम होने का दर्द


तेरे गुम होने का दर्द


क्या आपका अभी तक कुछ गुम हुआ है? फॉर एग्जांपल, दिल, पैसे, मोबाइल, मार्कशीट या रूम, अलमारी, ऑफिस, ड्रॉर की चाबी। और इनमें से किसके गुम होने का सबसे ज्यादा अफसोस हुआ या होता है?
यही सवाल मैनें अपने एक मित्र महोदय से किया। आंसर के तौर पर वे तपाक से बोले दिल गुम हुआ है, जो आज तक नहीं मि
ला। मैंने टेढ़ी निगाह से महोदय को घूरा और बोला अमां मियां जब दिल गुम हो चुका है तो तुम्हारे शरीर में जान क्यों बाकी है? खून पंप होना बंद क्यों नहीं हुआ? तुम मरे क्यों नहीं? अब मित्र महोदय की बोलती बंद, सें‌टियाने लगे।

मैं जान गया, दिल कहीं गुम नहीं होता, हम जबरदस्ती खुद को उसके गुम होने का अहसास कराते हैं, लेकिन आखिर तक वह अहसास हमें होता नहीं। क्योंकि वो सच नहीं होता।

मेरे एक और मित्र महोदय हैं, मैनें भी उनसे यही सवाल दागा। वे काफी रोनी सूरत में बोले भाईजान काफी दिन पहले मेरे पचास हजार रुपए गुम हुए हैं, जो आज तक नहीं मिले। महोदय के हाथ में एक लाल कलर की चमकीली बैग थी। मैंने पूछा इसमें क्या है? तो काफी ना-नुकु र के बाद बताया कि उसमें कुछ-एक लाख रुपए हैं। मैनें कहा, तो फिर गुम कहां हुए वो तो आपके पास ही हैं। बस दुगुने होने के लिए आपसे विदा हुए थ्ो।
कुछ देर मन मशक्कत करता रहा कि इतने में हमारे गंवइले चचा भिटा गए। अब मैनंे उनसे भी यही सवाल ठोंक दिया। वे तो जैसे ताव में आ गए, सांप की भांति फुंफकारते हुए बोले, अरे ससुरा हमरा मोबाइल गुम हुआ है। उसमें ससुर उस लौंडे का नंबर सेव किये रहे हम, जो हमरी बिटेना का मिस काल करके परेशान करत रहा। मैंने मन ही मन सोचा कि इनकी बिटेना तो कल ही गांव की बाजार वाली गली में पड़ोसी लौंडे से बतिया रही थी। खबर है दोनों का चक्कर भी चलता है।
मुझे सही जवाब मिलने की जगह, लोगों के गम की अलग-अलग वजहें मिलीं।
दरअसल कौन सी वस्तु के गुम होने से आपको दुख-अफसोस होगा। यह पूरी तरह आपकी कंडीशंस पर और उस वस्तु की इंपार्टेंस पर डिपेंड करता है।
कुछ ऐसे समझिए 'जरूरी कुछ भी नहीं और जरूरी सबकुछ है।’
कल शाम की ही बात है। आफिस से वापस आते समय रास्ते में कहीं मेरा चाबी का गुच्छा जेब को बिना इत्तिला किए या यूं मान लें कि उससे सांठ-गांठ साध कहीं सरक लिया। गुच्छा खुद तो गया ही अपने साथ आफिस ड्रॉर, रूम और अलमारी की चाबियों को भी बरगला ले गया।
अब मुझे अफसोस के साथ ग्लानि, तकलीफ और बेचैनी हो रही है। यह बेचैनी कब तक रहेगी? शायद आज रात तक, सुबह तक या पूरे दिन तक। लेकिन एक समय खत्म हो ही जाएगी। क्योंकि समय ही सब विपत्तियों और सुखों का जिम्मेदार होता है, और यह ‌िककिसी के लिए भ्‍ाी नहीं रुकता।

Friday, 1 August 2014

कई हजार ईसा पूर्व पैदा हुये अजूबे

विश्व के प्राचीन अजूबे


दुनिया बहुत सुन्दर है। प्रकृति ने अपने रंग से इस दुनियां को बहुत ही रंगीन बनाया है। समुद्र, पहाड़ और जमीन के मिलन से प्रकृति ने कुछ ऐसा नजारा हमारे लिए तैयार किया है जिसकी कल्पना करना इंसान के लिए कभी-कभी सपने जैसा हो जाता है। दुनिया में प्रकृति ने इतना रंग घोला है कि इंसान में भी इसे और सुन्दर बनाने की ललक पैदा हो गई। कभी अपनी याद के लिए तो कभी कला को समर्पण करने के लिए तो कभी किसी अन्य वजह से इंसान ने ऐसी कई रचनाएं की हैं जिनसे यह दुनिया और भी खूबसूरत बन गई है।
संसार में यूं तो इंसान द्बारा बनाई गई हजारों ऐसी कृतियां हैं जिन्हें देख आप अंचभे में पड़ जाएंगे लेकिन दुनिया के सात अजूबों की बात ही अलग है। अपनी शिल्प कला, वास्तु कला और भवन निर्माण कला के लिए दुनिया के सात अजूबे हमेशा चर्चा का विषय बने रहते हैं। आज बात कुछ प्राचीन एवं कई हजार ईसा पूर्व बूढ़े हो चुके अजूबों के बारे में।

 

मिस्र के पिरामिड 

मिस्र के पिरामिड दुनिया के प्राचीन सात अजूबों में एकमात्र सुरक्षित मिस्र के पिरामिडों का निर्माण आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व हुआ था। वास्तव में, ये पिरामिड मिस्र के शासकों के मकबरे हैं। सबसे बड़ा पिरामिड काहिरा से कुछ दूर गीजा कस्बे में स्थित है। यह राजा पैरोखूफू और उसकी रानी का मकबरा है। 481 फुट ऊंचे इस मकबरे के वर्गाकार आधार की प्रत्येक दीवार की लंबाई 75० फुट के लगभग है। इसमें बीस लाख से अधिक शिलाखंड हैं। माना जाता है कि दो हजार से भी अधिक मजदूरों ने बीस वर्षो तक कार्य करके इसे तैयार किया था।

मासोलस का मकबरा

संसार का तीसरा अजूबा हेलीकारनासस के शासक मासोलस का मकबरा था, जिसका निर्माण उसकी पत्नी ने करवाया था. यह लगभग सौ फुट ऊंचा था और उसके ऊपर घोड़े जुते रथ पर राजा-रानी की मूर्तियां थीं। निर्माण के कुछ ही दिनों बाद सकिदर महान के आक्रमण के कारण यह मकबरा ध्वस्त हो गया। राजा-रानी की मूर्तियां आज भी ब्रिटिश संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

देवी डायना का मंदिर

विश्व का चौथा अजूबा एफसेस में देवी डायना का मंदिर था। आठ फुट ऊंचे खम्भों पर टिके छत वाले इस मंदिर का निर्माण ईसा से साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व टर्की में हुआ था। इस समय यह मंदिर बहुत पवित्र माना जाता था। लोग इसमें अपना धन एवं कीमती वस्तुएं रखकर निश्चिंत हो जाते थे। 262 ई. में गोथ्स ने इस मंदिर को जला डाला था।

हीजियोस की कांस्य प्रतिमा

दुनिया का पांचवां अजूबा हीजियोस की कांस्य प्रतिमा थी। जो लगभग सौ फुट ऊंची थी। यह रोड्स द्बीप में थी। इसका निर्माण ईसा से 28० वर्ष पूर्व हुआ था। निर्माण के 56 वर्ष बाद यह प्रतिमा भूकंप में नष्ट हो गयी। जीयस देवता की मूर्ति संसार का छठा अजूबा ओलम्पिया में स्थित जीयस देवता की मूर्ति थी। इसे प्रसिद्ध शिल्पकार फीडिसस ने ईसा से साढ़े चार सौर वर्ष पूर्व बनाया था। चालीस फुट ऊंची इस मूर्ति के कपड़े सोने के थे। शरीर हाथी दांत का बना था। मूर्ति की आंखें कीमती हीरों से बनी थीं। इस मंदिर को ईसाइयों ने नष्ट कर दिया था।

फैरोह का प्रकाश स्तंभ 

दुनिया का सातवां अजूबा सकिदरिया के बंदरगाह के पास एक द्बीप पर बना फैरों का प्रकाश स्तम्भ था। सफेद संगमरमर से बना यह प्रकाश स्तंभ छह सौ फुट ऊंचा था। इसका निर्माण ईसा से 283 वर्ष पूर्व हुआ था। यह प्रकाश स्तंभ डेढ़ हजार वर्षों तक ठीक हालत में रहा, उसके बाद भूकंप में नष्ट हो गया।





 

Sunday, 13 April 2014

दुनिया का सबसे बड़ा होटल

दस हजार कमरों वाला दुनिया का सबसे बड़ा होटल

यूं तो पूरे विश्व में कई अजब-गजब इमारतें हैं, लेकिन जर्मनी में बाल्टिक सागर के आइलैंड में स्थित होटल प्रोरा अपने आप में एक अजूबा है। इस होटल में तकरीबन दस हजार कमरे हैं। इतने कमरों वाला होटल पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। आपको आश्चर्य होगा कि दुनिया का सबसे विशाल होटल पिछले 7० सालों से वीरान पड़ा है।
जर्मनी के नाजी शासन ने इस विशाल होटल दा प्रोरा का निर्माण 1936 से 1939 के बीच में करवाया था। इसे बनाने में 9,००० लेबरफोर्स को तीन साल लगे थे।
 
होटल प्रोरा में एक समान 8 बिल्डिंग बनाई गई हैं और हर बिल्डिंग की लंबाई 4.5 किलोमीटर है। यह बिल्डिंग समुद्र से बमुश्किल 15० मीटर दूर है। इसमें चार एक जैसे रिसॉर्ट थे, सभी में सिनेमा, फेस्टिवल हॉल और स्वीमिग पूल भी थे।
जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर का यह प्लान बहुत महत्वाकांक्षी था। वह एक घुमावदार सी रिसॉर्ट बनाना चाहता था, जो विश्व में सबसे विशाल हो। इस होटल के हर कमरे में दो बेड, एक अलमारी और एक सिक बनाया गया है। हर फ्लोर में टॉयलेट्स, शॉवर और सामूहिक बॉथरूम बनाए गए थे। बिल्डिंग के मध्य में यह व्यवस्था की गई थी कि युद्धकाल में इसे अस्पताल में बदला जा सके।
 
हिटलर का यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पूरा होता, इससे पहले ही द्बितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया। विश्वयुद्ध खत्म होने के बाद पूर्वी जर्मनी के विस्थापितों को इस होटल में रखा गया था। इसके बाद जर्मनी ने इसका उपयोग एक मिलिट्री पोस्ट के लिए किया।
आज भी यह बिल्डिंग काफी खूबसूरत लेकिन वीरान है। हालांकि इसके कुछ ब्लॉकों को छोड़कर बाकी खंडहर हो गए हैं। 


2०11 में इसके एक ब्लॉक में 4०० बिस्तरों वाला अस्पताल बनाया गया। अभी होटल प्रोरा को 3०० बिस्तरों वाले एक हॉलीडे रिसॉर्ट में बदलने की तैयारी चल रही है। इसमें नए सिरे से टेनिस कोर्ट, स्वीमिग पूल और शॉपिग सेंटर और हर वो चीज बनाई जानी प्रस्तावित है, जिससे यह अद्भुत स्थलों में शुमार हो सके।
 

Tuesday, 8 April 2014

बेल का खेल


बेल का अजब खेल

बेल का पेड़ विश्व के कई हिस्सों में पाया जाता है। भारत में इस वृक्ष का पीपल, नीम, आम और पलाश वृक्षों के समान ही बहुत अधिक सम्मान है। हिंदू धर्म में बेल का वृक्ष भगवान शिव की अराधना का मुख्य अंग है। बेल की तासीर बहुत शीतल होती है। गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी होता है। इसके फल व पत्तियों मंे टैनिन, आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं।
मान्यता है कि शिव को बेल-पत्र चढ़ाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। बिल्व के पेड़ का भी विशिष्ट धार्मिक महत्व है। कहते हैं कि इस पेड़ को सींचने से सब तीर्थों का फल और शिवलोक की प्राप्ति होती है।
बेल का वृक्ष यूं तो पूरे भारत में पाया जाता है लेकिन विशेष रूप से हिमालय की तराई, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों में चार हजार फीट की ऊंचाई तक यह पाया जाता है। मध्य व दक्षिण भारत में बेल वृक्ष जंगल के रूप में फैले हुए हैं और बड़ी संख्या में उगते हैं। यह भारत के अलावा दक्षिणी नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया एवं थाईलैंड में उगते हैं। इसकी खेती भारत के साथ श्रीलंका, उत्तरी मलय प्रायद्बीप, जावा एवं फिलीपींस तथा फीजी द्बीपसमूह में भी की जाती है।
 
यह पंद्रह से तीस फुट ऊं चा होता है। इसका कड़ा और चिकना फल कवच कच्ची अवस्था में हरे रंग और पकने पर सुनहरे पीले रंग का हो जाता है। कवच तोड़ने पर पीले रंग का सुगंधित मीठा गूदा निकलता है, जो खाने और शर्बत बनाने के काम आता है।

आयुर्वेद में बेल वृक्ष को कई प्रकार से लाभकारी बताया गया है। इसके पत्तों, फलों को औषधि के रूप में बहुत प्रयोग किया जाता है। बेल की जड़ों की छाल का काढ़ा मलेरिया व अन्य बुखारों में हितकर होता है। अजीर्ण में बेल की पत्तियों का रस काली मिर्च और सेंधा नमक में मिलाकर पीने से आराम मिलता है। अतिसार के पतले दस्तों में ठंडे पानी से इसका चूर्ण लेने पर आराम होता है। आंखें दुखने पर बेल के पत्तों का रस, स्वच्छ पतले वस्त्र से छानकर एक-दो बूंद आंखों में टपकाने से समस्या से निजात मिलती है। शरीर की त्वचा के जलने पर बेल के चूर्ण को गरम कर तेल में मिलाकर जले अंग पर लगाने से आराम मिलता है।
 

Sunday, 6 April 2014

कंकालों का घर

कंकालों का घर रूपकुंड झील

आप एडवेंचर ट्रैकिग के शौकीन है तो रूपकुंड झील आपके लिए एक बेहतरीन जगह है। रूपकुंड झील हिमालय के ग्लेशियरों के गर्मियों में पिघलने से उत्तराखंड के पहाड़ों में बनने वाली छोटी सी झील है।
यह झील 5०29 मीटर की ऊंचाई पर स्तिथ है, जिसके चारों और ऊंचे-ऊंचे बर्फ के ग्लेशियर हैं। यहां तक पहंुचने का रास्ता बेहद दुर्गम है इसलिए यह जगह एडवेंचर ट्रैकिग करने वालों की पसंदीदा है। यह झील यहां पर मिलने वाले नरकंकालों के कारण काफी चर्चित है। यहां पर गर्मियों में बर्फ पिघलने के साथ ही कहीं पर भी नरकंकाल दिखाई देना आम बात है। यहां तक कि झील के अंदर देखने पर भी तलहटी में भी नरकंकाल पड़े दिखाई दे जाते हैं। यहां पर सबसे पहला नरकंकाल 1942 में रेंजर एच.के. मड़वाल द्बारा खोजा गया था। तब से अब तक यहां पर सैकड़ों नरकंकाल मिल चुके हैं। जिसमंे हर उम्र व लिग के कंकाल शामिल हैं। यहां पर नेशनल जियोग्राफिक टीम द्बारा भी एक अभियान चलाया गया था जिसमे उन्हें 3० से ज्यादा नरकंकाल मिले थे।
इस जगह पर इतने सारे नरकंकाल आए कैसे? इसके बारे में अलग-अलग कहानियां प्रचलित हैं। 1942 में हुए एक रिसर्च से हड्डियों के इस राज पर थोड़ी रोशनी पड़ सकती है। रिसर्च के अनुसार ट्रैकर्स का एक ग्रुप यहां हुई ओलावृष्टि में फंस गया जिसमें सभी की अचानक और दर्दनाक मौत हो गई। हड्डियों के एक्सरे और अन्य टेस्ट में पाया गया कि हड्डियों में दरारें पड़ी हुई थीं जिससे पता चलता है कि कम से कम क्रिकेट की बॉल की साइज के बराबर ओले रहे होंगे। वहां कम से कम 35 किमी. तक कोई गांव नहीं था और सिर छुपाने की कोई जगह भी नहीं थी। आंकड़ों के आधार पर माना जा सकता है कि यह घटना 85० ईसवीं के आस पास की रही होगी।
एक दूसरी किंवदंती के मुताबिक तिब्बत में 1841 में हुए युद्ध के दौरान सैनिकों का एक समूह इस मुश्किल रास्ते से गुजर रहा था। लेकिन वे रास्ता भटक गए और खो गए और कभी मिले नहीं। हालांकि यह एक फिल्मी प्लॉट जैसा लगता है पर यहां मिलने वाली हड्डियों के बारे में यह कथा भी खूब प्रचलित है।
अगर स्थानीय लोगों के मानंे तो उनके अनुसार एक बार राजा 'जसधावल’ नंदा देवी की तीर्थ यात्रा पर निकला। उसको संतान की प्राप्ति होने वाली थी इसलिए वह देवी के दर्शन करना चाहता था। स्थानीय पंडितों ने राजा को इतने भव्य समारोह के साथ देवी दर्शन जाने को मना किया। जैसा कि तय था इस तरह के जोर-शोर और दिखावे वाले समारोह से देवी नाराज हो गईं और सबको मौत के घाट उतार दिया। राजा, उसकी रानी और आने वाली संतान को सभी के साथ खत्म कर दिया गया। मिले अवशेषों में कुछ चूड़ियां और अन्य गहने मिले जिससे पता चलता है कि समूह में महिलाएं भी मौजूद थीं। तो अगर आप सुपरनेचुरल और देवी-देवताओं में विश्वास करते हैं तो इस कहानी को मान सकते हैं। अपने साथ किसी स्थानीय व्यक्ति को ले जाइए और रात के समय यह कहानी उनसे सुनिए। आपके रोंगटे जरूर खड़े हो जाएंगे।


Friday, 4 April 2014

बहुत हो गई बेपरवाही


लाइफ का फंडा तो बदलना पड़ेगा बॉस


एक बिदास और स्मार्ट युवा लाइफ का यही फंडा है। खाओ, पियो और मौज करो। लेकिन जब इसी उम्र में चर्बी चढ़ने लगती है। सेक्सुअल डिसीज के आँकड़े बढ़ने लगते हैं और जब टेंशन के मारे युवा नशे के शिकार होने लगते हैं, तो फिक्र होना लाजिमी है। सो, बी केयरफुल, हेल्थ इज वेल्थ या यूं कहें कि जियो जी भर के मगर सलीके से।
ऐसा नहीं है कि यह उम्र लापरवाह होती है। अगर ऐसा होता तो सिक्स पैक एब और जीरो फिगर की चाह में युवा जिम में मशक्कत नहीं कर रहा होता। सभी युवाओं की इच्छा होती है वह सुंदर दिखें, सेहतमंद रहें लेकिन साथ ही उत्साह, जोश और मस्ती भी तो इसी उम्र का असर है। वह कहां-कहां से बचें और कितना बचें? उम्र की सारी खुशियां बटोरते हुए भी हेल्थ और ब्यूटी पाई जा सकती है। बस इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

 

लाइफ को समझें

युवाओं को पेरेंटस का रोकना-टोकना बुरा लगता है। लेकिन थोड़ा सा समझें कि वे इस उम्र से गुजर चुके हैं और उन्हें हमसे ज्यादा दुनियादारी का तजुर्बा है। ठीक है, उनका जमाना और था, हमारा जमाना और है। पर सेहत की बात तो हर वक्त उतनी ही सही और सटीक होती है, जितनी हमारे शरीर के लिए जरूरी है। हमें उनका कहा बुरा लगता है तो खुद सोचें कि क्या हम यूँ ही इस दुनिया से चले जाएँगे बिना अपने सपनों को साकार किए? नहीं ना? तो फिर सुबह जल्दी उठनाए मॉîनग वॉक पर जाना, जिम जाना या जंक फूड न खाना जैसी बातें हमें बुरी क्यों लगती हैं?
अगर हमें सपने पूरे करने हैं तो लंबे समय तक जीना होगा और जीने के लिए हेल्दी रहना होगा और हेल्दी रहने के लिए बस इन्हीं छोटी-छोटी बातों का पालन करना होगा। समझ गए ना ? तो जियो जी भर के मगर सही तरीके और सलीके से। अगर आपको पेरेंटस की रोक-टोक पसंद नहीं तो अपने नियम खुद बना लें आखिर सेहत भी तो आपकी है।

खुद करें चुनाव

यंगएज में उतावलापन, गुस्सा, तनाव, जोश सभी में नजर आता है। लेकिन हमें यह तय करना है कि हमें इतना गुस्सा क्यों आता है, किस बात पर आता है और किस पर सबसे ज्यादा आता है ? जब इनके जवाब खोज लें तो फिर यह तय करें कि आपके मन पर कौन राज करता है?
इसे कुछ यूँ समझें कि अगर कोई व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति आपको गुस्सा दिला रही है तो इसका मतलब है अपने मन पर आपने किसी और को डॉमेनेट करने की परमीशन दे रखी है। वो जब चाहे आपको गुस्सा दिला देता है। किस बात पर कितना गुस्सा करना है, यह कोई और नहीं, बल्कि आप खुद तय करें। अपने मन के राजा आप खुद बनें। इससे कम से कम दस बीमारियों से आप दूर रहेंगे। ऐसा मेडिकल साइंस कहता है।

टाइम-टेबल फिक्स करें

खाना, नहाना और सोना अगर जीवन में सिर्फ इन तीन बातों का भी आपने समय डिसाइड कर लिया तो समझो आपकी आधी लाइफ सुधर गई। समय पर खाने से शरीर का मेटॉबॉलिज्म सुधरता है। समय पर नहाने से शरीर का एक सही चक्र बनता है, जो सारे दिन फ्रेशनेश देता है। समय पर सोने से ब्रेन एक्टिव और हेल्दी रहता है। ब्रेन को पर्याप्त आराम मिलेगा तो आपकी डिसीजन मैकिग पॉवर स्ट्रांग होगी। अच्छी नींद, अच्छा खाना और अच्छे से नहाना ये बस सेहत के लिए ही नहीं सुंदरता के लिए भी जरूरी है।

गलतियों से बचें

इस दुनिया में ऐसा कोई नहीं जिससे गलतियाँ नहीं होतीं। लेकिन एक ही गलती को बार-बार करना गलत है और इससे भी ज्यादा गलत एक गलती को उम्र भर के लिए अपराध मान लेना है। हर समय पश्चाताप की आग में जलना सही नहीं है, जिस दिन आपको यह एहसास हो कि आप गलत थे, बस वही दिन आपका नया दिन है।
पुरानी सब बातों, गलतियों और भूलों के लिए खुद को माफ करो। कहते हैं, जो एक बार गिरता है, वह संभल कर चलना सीख जाता है। इसलिए सब बातों पर धूल-मिट्टी डालो और आगे बढ़ जाओ। दुनिया आपको आपकी गलतियों के लिए माफ करे ना करे। आप खुद को माफ करें और जरूरत पड़ने पर खुद को ही सजा भी दें। लेकिन खुद पर दया न करें न ही खुद पर अत्याचार करें। यह दोनों बातें ही हेल्थ को नुकसान पहुँचाती हैं।

Monday, 31 March 2014

कल्पवृक्ष....

आदिवासियों का कल्पवृक्ष

साल वृक्ष एक अर्ध-पर्णपाती और कई सालों तक जीवित रहने वाला वृक्ष है। इस वृक्ष की उपयोगिता प्रमुख रूप से इसकी लकड़ियां हैं, जो अपनी मजबूती के लिए प्रसिद्ध हैं। साल वृक्ष के बीज, जो वर्षा के आरंभ काल में पक जाते हैं। कहा जाता है कि पूर्व समय में अकाल पड़ने पर आदिवासी इसी वृक्ष के फल खाकर जीवित रहते थ्ो। विशेषकर अकाल के समय अनेक जगहों पर भोजन के रूप में काम आते थे। इसीलिए आदिवासियों के लिए यह वृक्ष किसी 'कल्प वृक्ष’ से कम नहीं माना जाता। यूं तो इसका फल ही इतना मीठा होता है कि चीनी खाने के समान स्वाद मालूम होता है वहीं इसकी टहनी से निकलने वाले रस से प्यास भी बुझाने के काम आता है।
यह वृक्ष भारत के कई हिस्सों में पाया जाता है। भारत, बर्मा तथा श्रीलंका में इसकी कुल मिलाकर नौ प्रजातियां हैं, जिनमें 'शोरिया रोबस्टा’ प्रमुख है। हिमालय की तलहटी से लेकर तीन से चार हजार फुट की ऊंचाई तक और उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार तथा असम के जंगलों में यह प्रमुखता से उगता है। इस वृक्ष का विशेष और मुख्य लक्षण यह है कि ये अपने आपको विभिन्न प्राकृतिक मौसमों के अनुकूल बना लेता है।
 
भरी गर्मी में घने जंगलों में जब कंठ सूखने लगे और पीने का पानी न हो तो साल वृक्ष की टहनी से बूंद-बूंद टपकने वाले रस को दोने में एकत्र कर ग्रामीण अपनी प्यास बुझा लेते हैं। यह परंपरागत तरीका वर्षों से आदिवासी अपनाए हुए हैं। जंगलों में कोसा, सालबीज, धूप, तेंदूपत्ता आदि के संग्रह के लिए पहुंचने वाले ग्रामीण आमतौर पर पानी साथ लेकर नहीं जाते। ये लोग जंगल में पहुंचते ही साल वृक्ष के पत्ते का दोना तैयार करते हैं। इसके बाद पत्तों से लदी साल की टहनी काटकर उल्टा लटका देते हैं। कटी हुई टहनी का रस बूंद-बूंद टपकता है, जिससे दोना भर जाता है और ग्रामीण अपनी प्यास बुझा लेते हैं। इसीलिए साल वृक्ष के रस का उपयोग सदियों से किया जा रहा है। साल वृक्ष मानव के लिए बहुत ही लाभदायक है, इससे प्राप्त पत्ते, फल, लकड़ी, धूप, दातून यहां तक पानी भी संग्रहित किया जाता है।
 
साल वृक्षों की जड़ों के आस-पास कई तरह की सब्जियां पनप जाती हैं। जिसमें मशरूम प्रमुख है। साल वृक्ष के पत्तों से दोने में उतरा रस एक प्रकार से पूर्ण भोजन है, जिसे शर्करा भोजन कहा जा सकता है। इसमें प्रोटीन को छोड़ कर शेष सभी तत्व होते हैं। यह रस जमीन से वृक्ष द्बारा तत्व युक्त जल है। इसके सेवन से शरीर को तरलता मिलती है। कोई हानि नहीं होती है।