Monday, 25 March 2019

दलित और मुस्लिम देते हैं सहारनपुर लोकसभा सीट को सहारा


रिजवान नूर खान 

सहारनपुर संसदीय सीट पर लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया सोमवार 18 मार्च को शुरू हो गई। इसके साथ ही सहारनपुर लोकसभा क्षेत्र में राजनीतिक सरगर्मी भीअपने चरम पर पहुंच गई है। यह सीट कई मायनों में सभी राजनीतिक दलों के लिए अहम है। पहले चरण में 11 अप्रैल को इस निर्वाचन क्षेत्र में मतदान होना है। संभावित प्रत्याशियों ने लोगों को लुभाने के लिए वादों का जाल फेंकना शुरू कर दिया है। ऐसे में यहां सभी प्रमुख दलों ने अपनी जीत पक्की करने के लिए कमर कस ली है। आइए जानते हैं पहले लोकसभा चुनाव से लेकर अबतक सहारनपुर लोकसभा के राजनीति सफर के बारे में-  


इस लिंक पर पढ़े विश्‍लेषण....


सबसे ज्यादा पांच बार राशीद बने सांसद

सहारनपुर लोकसभा सीट पहले लोकसभा चुनाव से ही कांग्रेस का गढ़ बन गई। यहां 1952 से 1971 तक लगातार चार लोकसभा चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशियों ने विजयी पताका फहराया। कांग्रेस के इस विजय अभियान को जनता पार्टी सेक्यूलर के नेता राशीद मसूद ने रोका। इस लोकसभा क्षेत्र से सबसे ज्यादा पांच बार राशीद मसूद सांसद चुने गए। खास बात यह रही कि वह चार बार पार्टी बदलकर चुनाव लड़े और जीते। इस लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी को सिर्फ एक बार ही जीत का स्वाद चखने को मिला है, जबकि बहुजन समाज पार्टी दो बार यहां से जीती है और भाजपा तीन बार इस सीट पर विजेता बनी है।

दूसरे लोकसभा चुनाव में मिला स्वतंत्र सीट का नाम

दलित और मुस्लिम बाहुल्य यह क्षेत्र 1951 में हुए पहले लोकसभा चुनाव के दौरान दो लोकसभा क्षेत्रों में बंट गया था। इस क्षेत्र का एक हिस्सा देहरादून जिला और बिजनौर उत्तर-पूर्व लोकसभा सीट का हिस्सा था, जबकि दूसरे हिस्‍से का नाम सहारनपुर पश्चिम और मुजफ्फरनगर उत्तर लोकसभा सीट था।1957 में हुए लोकसभा चुनाव से पहले इस निर्वाचन क्षेत्र को दोबारा गठित कर सहारनपुर लोकसभा का नाम दिया गया। 1957 में दूसरी लोकसभा के चुनाव में इस क्षेत्र से कांग्रेस ने अजीत प्रसाद जैन और सुंदरलाल को चुनाव लड़ाया था। अजीत प्रसाद को 202081 लाख वोट मिले, जबकि सुंदर लाल को 161181 लाख वोट मिले। दोनों उम्मीदवारों को विजेता घोषित किया गया। गौरतलब है कि संभवत: उस वक्त लोकसभा क्षेत्र का आकार बड़ा होने के चलते दो विजेता घोषित किए गए थे और यह स्थिति देश के 40 से अधिक लोकसभा क्षेत्रों की थी। इस सीट पर निर्दलीय लड़े अख्तर हसन ख्वा़जा 138996 लाख वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे थे।

जब पांच लाख वोटों से जीती थी कांग्रेस

1962 में सहारनपुर लोकसभा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी। कांग्रेस की लहर में इस निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर लड़े सुंदर लाल ने 104709 लाख वोट हासिल करकेजीत दर्ज की। उन्होंने जनसंघ के ममराज को पांच लाख से ज्यादा वोटों के अंतर सेहराया था। इसी तरह 1967 के चुनाव में भी कांग्रेस से लड़े सुंदर लाल ने 120891 लाख वोट हासिल कर जीत दर्ज की। सम्युक्त सोशलिस्‍टपार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे एस सिंह 83239 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे। कांग्रेस की जीत का यह सिलसिला 1971 में भी चला। 1977 में छठी लोकसभा के लिए हुए मतदान में यहां कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस की लहर यहां थम गई। भारतीय लोकदल के उम्मीदवार राशीद मसूद ने कांग्रेस प्रत्याशी जाहिद हसन को करारी शिकस्त दी। राशीद मसूद सातवीं लोकसभा के लिए 1980 में भी सहारनपुर से सांसद चुने गए। वह जनता पार्टी सेक्यूलर के टिकट पर चुनाव लड़े थे।

दो बार की हार के बाद जीती कांग्रेस

1984 में कांग्रेस ने सहारनपुर सीट पर पलटी मारी और दो बार की हार के बाद जीत हासिल की। कांग्रेस के यशपाल सिंह को 277339 लाख वोट मिले,  जबकि भारतीय लोकदल प्रत्याशी राशीद मसूद को 204730 लाख वोट हासिल हुए। इसके बाद 1989 और 1991 के लोकसभा चुनाव में राशीद मसूद जनता दल प्रत्याशी बने और जीत हासिल की। कांग्रेस दोनों बार यहां दूसरे नंबर पर आई। इस बीच भाजपा नेदेश की राजनीति में बढ़त बनाते हुए 1996 और 1998 में सहारनपुर सीट को अपने नाम कर किया।

1999 में बसपा ने दर्ज की जीत

1999 में 13वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में सहारनपुर सीट पर बसपा ने जीत हासिल की। यहां रालोद के राशीद मसूद ने बसपा उम्मीबदवार को कड़ी टक्कर दी। उन्हें 213352 लाख वोट मिले, जबकि विजेता बसपा प्रत्याशी मंसूर अली खान को 235659 लाख वोट मिले। कई दल बदलने वाले राशीद मसूद ने 2004 का लोकसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर लड़ा और जीत हासिल की। राशीद को बसपा प्रत्याशी मंसूर अली खान ने कड़ी टक्कर दी। राशीद को 353271 लाख वोट मिले, जबकि मंसूर को 326441 लाख वोट प्राप्त हुए। 15वीं लोकसभा के लिए 2009 में सहारनपुर सीट पर बसपा ने कब्जा जमाया। उसके प्रत्याशी जगदीश सिंह राणा को354807 लाख वोट पाए, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी सपा नेता राशीद मसूद को 269934 लाख वोट मिले।

16 साल बाद भाजपा को मिली जीत

16वीं लोकसभा के लिए 2014 के चुनाव में मोदी लहर का असर रहा और सहारनपुर सीट पर भाजपा को 16 साल बाद जीत नसीब हुई। इससे पहले भाजपा 1998 में इस सीट से चुनाव जीती थी। 2014 में भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल को 472999 लाख वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस नेता इमरान मसूद को 407909 लाख वोट हासिल हुए।

राजा सहारन पीर ने बसाया था सहारनपुर

सहारनपुर की स्थापना 1340 के आसपास हुई और इसका नाम एक राजा सहारन पीर के नाम पर पड़ा। सहारनपुर की काष्ठ कला और देवबन्द दारूल उलूम विश्वपटल पर सहारनपुर को अलग पहचान दिलाते हैं। सहारनपुर में प्राचीन शाकुम्भरी देवी सिद्धपीठ मंदिर, इस्लामिक शिक्षा का केन्द्र देवबन्द दारूल उलूम, देवबंद का मां बाला सुंदरी मंदिर, नगर में भूतेश्वर महादेव मंदिर औरकम्पनी बाग इसके प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। लकड़ी पर नक्काशी करने का काम सहारनपुर में काफी अधिक होता है। लखनऊ से इसकी दूरी 702.6 किलोमीटर और दिल्ली से करीब 200 किलोमीटर है।

Thursday, 21 March 2019

लोकसभा चुनाव 2019: जाट और मुस्लिम तय करते हैं कैराना की किस्मत, इस बार करारा संघर्ष

रिजवान नूर खान 

कैराना संसदीय सीट के लिए 18 मार्च (सोमवार) से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। परंपरागत रूप से रालोद के लिए खास रही इस सीट पर इस बार भी कांटे का मुकाबला है। मुस्लिम और जाट बाहुल्यस इस निर्वाचन क्षेत्र में राजनीतिक दलों का जातीय समीकरण बैठाने का गणित जनता अक्सलरगलत साबित करती रही है। यही वजह है कि 2014 में यहां से जीते भाजपा के हुकुम देव सिंह के निधन के बाद हुए उपचुनाव में रालोद की प्रत्याशी तबस्सुम हसन ने भाजपा को शिकस्त  दे दी। यहां हम कैराना लोकसभा क्षेत्र की पूरी चुनावी और राजनीतिक तस्वीतर आपके सामने पेश कर रहे हैं-

आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा के साथ हुए चुनावी गठबंधन में रालोद के हिस्सें में यह सीट गई है। यहां पहले चरण में 11 अप्रैल को मतदान होना है।


दो बार से अधिक नहीं मिली किसी को जीत

कैराना लोकसभा सीट का इतिहास रहा है कि यहां पर कोई भी दल दो बार से ज्यादा लगातार जीत हासिल नहीं कर सका है। मुस्लिम और जाट बाहुल्य इस निर्वाचन क्षेत्र में राजनीतिक दलों का जातीय समीकरण बैठाने का गणित जनता अक्सर गलत साबित करती रही है। ऐसा इसलिए क्यों कि इस सीट पर किसी भी दल का कभी भी वर्चस्व नहीं रहा है। यहां की जनता हर बार परिवर्तन कर काबिज दल को बाहर कर देती है। यह सिलसिला पहले लोकसभा चुनाव से चला आ रहा है। यहां पर कांग्रेस की लहर के बावजूद पहले लोकसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी ने भारी मतों से जीत हासिल कर कांग्रेस को हराया था। बाद में यहां जनता दल के प्रत्याशी ने लगातार दो बार 1989 और 1991 में जीत हासिल की, लेकिन तीसरी बार वह जीत नहीं सके। इसी तरह यह कारनामा अजीत सिंह चौधरी की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल ने 1999 और 2004 में कर दिखाया, लेकिन वह भी तीसरी बार लगातार जीत हासिल नहीं कर सके। अब तक भाजपा, बसपा और सपा, जनता पार्टी सेक्युलर ने इस लोकसभा सीट पर सिर्फ एक-एक बार ही जीत दर्ज की है।

 

जब नहीं चली कांग्रेस की लहर, निर्दलीय ने चटाई धूल 

देश के लिए तीसरी बार हुए लोकसभा चुनाव के दौरान अस्तित्व में आई कैराना लोकसभा सीट जाट और मुस्लिम समुदाय बाहुल्य होने के चलते कड़े चुनावी मुकाबलों की गवाह रही है। 1962 में जब देश भर में कांग्रेस की लहर चल रही थी, तब यहां से कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी। 1962 में पहली बार इस लोकसभा सीट पर हुए मतदान में निर्दलीय उम्मीदवार यशपाल सिंह ने उस समय देश की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस के दिग्गज नेता अजीत प्रसाद जैन को हराया था। यशपाल को 134574 लाख वोट मिले, जबकि अजीत को 81140 वोट मिल थे। गौरतलब है कि अजीत प्रसाद जैन 1951 में सहारनपुर लोकसभा सीट से सांसद रह चुके थे।

1967 में जातीय समीकरण ने खिलाया गुल 

1967 में जब चौथी लोकसभा के गठन के लिए चुनाव कराए गए, तब कैराना सीट पर दूसरी बार संसदीय चुनाव हुआ। देश भर में वर्चस्व कायम रखने वाली कांग्रेस ने एक बार फिर यहां से अजीत प्रसाद जैन को चुनाव मैदान में उतारा। उनके सामने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने जीए खान को प्रत्याशी बनाया। दोनों नेताओं के बीच कड़ा संघर्ष हुआ। जीए खान ने 76415 वोट पाकर जीत हासिल की। अजीत को 74750 वोट मिले। दोनों के बीच हार का अंतर दो हजार से भी कम वोटों का रहा। 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर चुनावी मैदान में ताल ठोकी और जातीय समीकरण का लाभ लेने के लिए मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट थमाया। इसका नतीजा भी कांग्रेस के लिए खुशियां लेकर आया। कांग्रेस उम्मीदवार शफकत जंग ने 162276 लाख वोट हासिल किए, जबकि भारतीय क्रांति दल के प्रत्याशी गयूर अलीखान को 89510 वोट के साथ हार का सामना करना पड़ा।

आपातकाल ने कांग्रेस को दिया था जोर का झटका

कैराना सीट पर 1977 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए बेहद खराब रहा। यहां से तत्कालीन सांसद शफकत जंग अपनी सीट नहीं बचा सके। उन्हें लोकदल के प्रत्याशी चंदन सिंह ने करारी शिकस्त दी। चंदन को 242500 लाख वोट हासिल हुए, जबकि कांग्रेस के शफकत को 95642 वोट ही मिले। 1980 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी सेक्यूलर की नेता गायत्री देवी ने 203242 लाख वोटों के साथ विजेता बनीं। कांग्रेस इंदिरा के प्रत्याशी नारायण सिंह 143761 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे। 1984 के संसदीय चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की। कांग्रेस प्रत्याशी अख्तर हसन 236904 वोटों के साथ विजेता बने। लोकदल प्रत्याशी श्याम सिंह 138355 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे।

1989 में जनता दल ने की फतह 

1989 का लोकसभा चुनाव इस सीट से जनता दल प्रत्याशी हरपाल सिंह ने 306119 लाख वोटों के साथ जीता। प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस नेता बशीर अहमद 184290 लाख वोट पाकर हार गए। जनता दल ने 1991 का चुनाव भी इस सीट से अपने नाम किया। हालांकि1996 में कैराना सीट पर समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की। इस बार सपा नेता मुनव्वर हसन ने 184636 लाख मत पाकर जीत दर्ज की,जबकि दूसरे नंबर पर रहे भाजपा नेता उदयवीर सिंह को 174614 मतों से ही संतोष करना पड़ा। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी और एलके आडवाणी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में भाजपा की लहर चली। इस तरह दो बार से हार का सामना कर रही भाजपा ने कैराना सीट अपने नाम की। यहां से उसके प्रत्याशी वीरेंद्र वर्मा के जीत मिली और सपा नेता मुनव्वर हसन को हार का सामना करना पड़ा।

इस बार रालोद ने भाजपा से लिया बदला 

1999 में 13वीं लोकसभा के लिए हुए मतदान में कैराना लोकसभा क्षेत्र की जनता ने राष्ट्रीय लोकदल पर विश्वास जताया और उसके प्रत्याशी आमिर आलम 206345 लाख वोट पाकर विजेता बने। दूसरे नंबर पर यहां से बीजेपी के निरंजन सिंह मलिक रहे। 2004 के लोकसभा चुनाव में भी राष्ट्रीय लोकदल ने अपना जादू कायम रखा और उसकी अनुराधा शर्मा को भारी मतों से जीत मिली। रालोद की जीत का यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका। 2009 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने सेंध लगाते हुए सीट रालोद से यह सीट हथिया ली। बसपा प्रत्यााशी तबस्सुम बेगम ने 283259 लाख वोट पाकर विजेता बनीं। दूसरे नंबर पर 124802 लाख वोट पाकर सपा नेता साजन मसूद रहे। कांग्रेस तीसरा और भाजपा को चौथा स्थान हासिल हुआ। 2014 में भाजपा ने यहां पलटी मारी और कैराना लोकसभा सीट पर कब्जा जमाया। यहां से भाजपा नेता हुकुम देव सिंह ने भारी मतों से जी‍त हासिल की। उनका असमय निधन होने के बाद यहां हुए उप चुनाव में भाजपा ने यह सीट गंवा दी। यहां से सपा और रालोद की गठबंधन प्रत्या शी तबस्सुम हसन ने फिर जीत हासिल की।

कर्णपुरी के नाम से जाना जाता था कैराना  

कैराना उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। कैराना प्राचीन काल में कर्णपुरी के नाम से जाना जाता था, जो बाद में बिगड़कर किराना नाम से जाना गया और फिर कैराना हो गया। मुजफ़्फ़रनगर से करीब 50 किलोमीटर पश्चिम में हरियाणा पानीपत से सटा यमुना नदी के पास बसा कैराना राजनीतिक पार्टी राष्ट्रीय लोकदल का घर भी माना जाता है। यहां मुस्लिम और जाट मतदाताओं की संख्या अधिक है। हालांकि यह जातिगत आंकड़ा हर बार एक जैसा चुनावी फैसले नहीं करता है। इस लोकसभा क्षेत्र के तहत पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से कैराना की दूरी करीब 103 किलोमीटर है।

इस आर्टिकल को दैनिक जागरण की वेबसाइट पर भी पढ़ा जा सकता है। लिंक ये रहा.....
https://www.jagran.com/elections/lok-sabha-lok-sabha-election-2019-know-everything-about-kairana-lok-sabha-seat-19061340.html

Thursday, 17 January 2019

बकरी और अबरार का दर्द

बकरियां बुरी तरह डरी हुई हैं। अभी रात के दो बज रहे हैं। उनके शोर से घर के सभी लोग जग गए हैं। मुहल्ले में भी जनसर हो गई। पहले बड़ी वाली बकरी ही चिल्ला रही थी, धीरे धीरे पांचों बकरियां शोर करने लगीं। मैं इस्माइल के घर में हूं। उसके घर के बरोठे का ये नजारा वाकई में सबके लिए चौकाने वाला है। लेकिन कोई समझ कुछ नहीं पा रहा है। उसके अब्बा (बाबा) जग तो गए हैं लेकिन मच्छरदानी से बाहर नहीं निकलना चाहते। दरअसल बरोठे में जहां बकरियां बंधीं हैं वहां मच्छर कुछ ज्यादा हैं। वे चारपाई से ही सबको हांक रहे हैं, सब अपने-अपने घर जाओ, भीड़ मत बढ़ाओ। बकरियां अपने आप चुप हो जाएंगी। उनकी ऐसी बेरुखी से कुछ लोग जा चुके हैं, कुछ जा रहे हैं।

बकरियों का यूं चिल्लाना अबरार से सहन नहीं हो रहा। इससे पहले उसने अपनी बकरियों को यूं सहमते नहीं देखा। वही तो है जो बकरियों को खेतों में चराने ले जाता है। वह आठ साल का है। बकरियां उसे बहुत प्यारी हैं। एकतरह से बकरियां उसकी दोस्त हैं। स्कूल से आते ही कडुए तेल से चुपड़ी और बुकनू लगी रोटी ले वह उन्हें चराने चल देता है। मुहल्ले के लोग उसे नन्हा बरेदी कहते हैं। ग्रामीण इलाकों में बकरियां पालने वाले को बरेदी कहा जाता है। बकरियां अभी भी सहज नहीं हुई हैं। अबरार सुबक रहा है। उसने सभी बकरियों के नाम रखे हैं। जो सफेद-काली है उसे चितकबरी, जो लाल-काली है उसे लालमनी और छोटी वाली बकरी को वह छुनिया बुलाता है। इसी तरह बाकी बकरियों के भी नाम रखे हैं। छुनिया बाकी बकरियों की तरह नहीं चिल्ला रही बस बीच-बीच म्हे कर देती है। पर इस म्हे में दर्द बहुत है। छुनिया गर्भ से है, कुछ ही महीनों में वह भी मां का सुख भोगेगी। अबरार की सुबकन मुझसे नहीं देखी जा रही। बाकी लोग भी द्रवित हैं।

सुनातर या बरजतिया देख लिया होगा तभी चिल्ला रही हैं, अभी चुप हो जाएंगी, सोओ जाके सब लोग बतंघड़ न बनाओ, मंझली चच्ची गुस्से में सबसे बोलीं और दांत में दुपट्टा दबाके सोने चली गईं। सुनातर और बरजतिया सापों को कहा जाता है। सुनातर को सुनाई नहीं देता और बरजतिया काफी बड़ा होता है, तेज भागता है। गांवों में अक्सर ये सांप देखे जाते हैं, लेकिन वे बिरले ही लोगों को काटते हैं। वे चूहों के शिकार के लिए घरों में आ जाते हैं। ज्यादातर भूसा वाली कुठरिया में लकड़ी या कंडों के बीच छिप जाते हैं।

इस बीच राजू चाचा बोले चिटकान्हा हुई सकत है। धत्त झटिहा सार, भाग हेन ते बड़ा आओ बतावन चिटकान्हा हुई सकत है। अब्बा के अईसे गरियाने से राजू चाचा सकपका गए और धीरे से वहां से खिसक लिए। अब्बा मुहल्ले भर के अब्बा हैं, वे सब पे अपना हक जताते हैं। इसलिए उन्हें ज्यादातर लोग अब्बा ही कहते हैं। अब्बा का पारा गरम देख सब बगलें झांकने लगे और जाने को हुए कि तभी हवा का तेज झोंका आया और किवाड़े के बगल में ताक पर जल रहे चराग को बुझा गया। अब बरोठे में घुप्प अंधेरा हो गया। बकरियां जो थोड़ा सा चुप हुईं थीं अब फिर से चिल्लाने लगीं। अब्बा पहले से ही गुस्साए थे अंधियारा होने पर और तेजी से चिल्लाए, चराग कौन जलाएगा।

रहमान आंगन की तरफ भागा और चारपाई में बिछे बिस्तर में माचिस टटोलने लगा। चूल्हे के पास देख जा के वहीं रखी है माचिस, अम्मा ने जोर से कहा। रहमान ने चूल्हे के पास, पखिया और खाना रखने वाली दीवार में बनी टीपारी में माचिस ढूंढी पर न मिली। 
बाहर जा मेरे बिस्तर में सिरहाने रखे कुर्ते में माचिस है ले के आ, अब्बा ने गरजते हुए कहा। रहमान ने कुर्ते से माचिस निकाल ली। उसने साथ में बालक बंडल से चार ठो बीड़ी भी निकालकर जेब में छिपा लीं। रहमान 15 बरस का है। गांव के अधिकांश किशोरवय लड़के बीड़ी और स्वागत तम्बाकू खाने लगे हैं। कुछ वक्त पहले गांव के भोला और महेश अपने पापा की बीड़ी चुराकर फूंकते पकड़े गए थे तो बहुत मार पड़ी थी। तब से सब नशा-पत्ती से दूर थे। लेकिन अब के छिटांक-छिटांक भर के लड़के चौधरी और पॉवर गुटखा भी खाते हैं, लेकिन छिप-छिपाकर। दांत लाल हो गए हैं, उन्हें साफ करने के लिए एक-एक घंटे तक नीम की दातून घिसते हैं। ज्यादातर नदिया किनारे बीड़ी पीने जाते हैं। कई सुबह शौच से पहले बीड़ी पीते हैं। बीड़ी नहीं मिलती तो उनका पेट साफ नहीं होता है। गांव के ज्यादातर मर्द नदी किनारे खुले में शौच करने जाते हैं। युवाओं की संख्या इनमें ज्यादा है। किसी-किसी के घर में ही शौचालय है।

अब्बा ने झिड़कते हुए रहमान के हाथ से माचिस छीनी और चराग जलाया। अभी एक मिनट भी न हुआ था कि चराग मद्धम होते हुए बुझने लगा। उन्होंने चराग हिलाया तो उसमें तेल खत्म हो गया था। अब वे फिर चिल्लाये, कोई काम ढंग से नहीं हो पाता है। न जाने का करेंगे सब। अब्बा और चिल्लाते इससे पहले ही अम्मा बोल पड़ीं- मिट्टी का तेल खत्म हो गया है। अबकी महीने में कोटेदार ने दुई लीटर तेल ही दिया था। एक चराग आप छपरा तरे रखते हो, दूसरा चूल्हे के पास रहता है जो बाद में रहमान और अबरार पढ़ने के लिए उठा ले जाते हैं और तीसरा बरोठे में बकरियों के पास जलता है, तीन ही चराग तो हैं घर में। इतना कहते-कहते अम्मा झुंझला गईं और आंगन में बिछी चारपाई पर जाके धम्म से बैठ गईं। ये सुनकर अब्बा का चेहरा और तमतमा गया। बोले-पब्लिक के लिए साला आता 5 लीटर तेल है पर मिलता तीन लीटर ही है, उसमें भी किसी-किसी महीने तो कोटेदार तेल गोल कर जाता है। अबकी तो दुई लीटर ही दिया हरामखोर ने। राशन के भी यही हाल हैं। मनमर्जी चल रही है सबकी। सब खुदै का अधिकारी और नेता समझत हैं। अईसे ही रहा तो अबकी साली सरकार बदलीही जाएगी।
अब्बा चराग जलाओ, रहमान ने कहा। अब्बा ने रहमान के लाये चराग को जलाया।

बकरियां अब पहले से थोड़ा शांत थीं पर पूरी तरह नहीं। एक चुप होती तो दूसरी चिल्लाने लगती। मैं आंगन में पड़ी चारपाई में जा के पसर गया। सुबह के चार बजे गए थे। आसमान का कालापन कम हो रहा था। तारे अब कम गाढ़े दिख रहे थे। शंकर जी के मंदिर की घंटियां भी बजनी शुरू हो गईं थीं। आरती का समय हो गया था। मैं कब सो गया पता ही नहीं चला।
सुबह आंख खुली तो मैं उठा और बरोठे में गया जहां बकरियां बंधीं थीं, वहां एक भी बकरी नहीं थी। कोने में ढेर सारी राख फैली थी। मैं आंगन में फिर लौटा और चच्ची के कमरे की तरफ आवाज लगाई, पर कोई नहीं बोला। पास गया तो देखा दरवाजे पर कुंडी लगी हुई थी। पूरे घर में सन्नाटा पसरा था। मैं चारपाई में फिर बैठ गया। तभी बाहर से जोर-जोर से आवाजें आने लगीं तो बाहर की भागा और सीधे बाहर चउरा पर पहुंच गया। वहां लोगों की भीड़ लगी थी। रहमान, अब्बा, अम्मा, राजू चाचा और गांव भर के लोग जूट थे। एक किनारे अबरार बैठे रो रहा था उसके पास ही खून बिखरा पड़ा था। पास पहुंचा तो मैं अवाक रह गया। मुझे देख अबरार मुझसे चिपट गया और जोर-जोर से रोने लगा। पास में ही उसकी सबसे प्यारी बकरी छुनिया मरी पड़ी थी। उसके मुंह से झाग निकला हुआ था। बगल में उसका भ्रूण भी पड़ा था। राजू चाचा ने बताया किसी ने अब्बा से दुश्मनी निकालने के लिए रात में छुनिया के पेट में लात-घूंसे चलाये और कोई देख पाए इससे पहले ही भाग निकला। बाहर रास्ते की तरफ सो रहे चम्पू ने रात में अब्बा के बरोठे से निकल भागकर जाते एक आदमी को देखा था पर अंधेरा होने की वजह से वह पहचान नहीं पाया। चम्पू ने भी मुझसे इस बात की तस्दीक की। डॉक्टर साहब बता गए थे कि छुनिया को घास में मिलाकर जहर भी खिलाया गया।

घर वाले, मुहल्ले वाले सब गुस्से में हैं। हमारी तो किसी से दुश्मनी भी नहीं, कोई बेजुबानों से कैसे रंजिश निकाल सकता है, अम्मा रो रोकर कह रही हैं। अब्बा उन्हें ढांढस बंधा रहे हैं। बाकी बकरियां सदमे में हैं। किसी ने घास तक नहीं खाई है, वे पागुर तक नहीं कर रहीं हैं। घनघोर शोक में हैं वो। अबरार अभी भी मुझसे लिपटा हुआ है, उसके आंसुओं से मेरे पेट के पास की शर्ट गीली हो चुकी है। बाकी बची बकरियों और अबरार का दर्द एक है। उसे कोई नहीं समझ पाएगा। ये पीड़ा असहनीय है।

Sunday, 28 October 2018

रेख्ताओं में मीर तकी मीर और उनकी मुहब्बत

मेरे परम मित्र हैं नीलेश और सूरज। सूरज की एक सोशल मीडिया पोस्ट पर नीलेश ने टिप्पणी लिखी जो मुझे महान शायर मीर तकी मीर से मिला लाई। टिप्पणी कुछ इस प्रकार थी कि....
"ग़लत है ये, तुम तो भड़के आशिक़ हो और शायरी लिखना तुम्हारा पेशा है।"
ये लफ्ज़ सीधा मीर तकी मीर से ताल्लुक रखते हैं। ऐसा मेरा मानना है। तो फिर आइये मैं आपको अपने मीर से मिलाता हूं।

ये मीर के जवानी के दिन थे। दिल्ली सल्तनत में बादशाह समसामुद्दौला के यहां महान शायर मीर तकी मीर ने उर्दू शायरी को एक मुकाम पर पहुचा दिया। ये बात करीबन 1735 के आसपास की है। बादशाह ने मीर को एक रुपये के वजीफे पर अपने यहां रख लिया। मीर अपनी शायरी और रेख्ताओं में उर्दू ज़बान के साथ हिंदुस्तानी लफ़्ज़ों का खूब इस्तेमाल करते थे। यही वजह रही कि दरबार मीर की शेर-ओ-शायरी में डूब गया। कुछ वक्त के लिए वे अपने घर यानी आगरा लौट आये।


इस बीच करीब 1739 में फारस के बादशाह नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण कर दिया। कई दिनों तक चले युद्ध में बादशाह समसामुद्दौला मारे गए। तख्त छिन गया और नादिरशाह ने सल्तनत पर कब्ज़ा कर लिया। इस घटना ने मीर को झकझोर दिया। उनका वजीफा भी बंद कर दिया गया। वह दिल्ली में ही अपने सौतेले भाई के मामू सिराजुद्दीन अली खान आरजू के यहां रहने लगे। सिराजुद्दीन भी ग़ज़ब शायर थे।

इस दरमियान मीर को बला की खूबसूरत महताब बेगम से मोहब्बत हो गई। महताब भी मीर के शायराना अंदाज़ में पाबस्ता हो गईं। अब मीर की शायरी और रेख्ताओं में इश्क की चाशनी घुल गई। वे अक्सर जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठे शायरी कहा और लिखा करते। बात भी शायराना अंदाज़ में ही करते। मीर सारे जमाने में मशहूर हो गए। गोशे गोशे में उनके रेख्ता बैठ गए, उनके मुहब्बत में डूबे कलाम बुलंदियां चूमने लगे। महताब और मीर की मुहब्बत चिड़िया की मानिंद हवा में उड़ान भरने लगी। इश्क को नज़र लगते देर नहीं लगती। बाजार में इश्क के चर्चे होने लगे। मीर से जलने वाले दूसरे शायरों ने दरबार में मनमाफिक बातें पेश कीं। बादशाह तक बात पहुंची तो कहर हो गया। कहते हैं बादशाह भी महताब के हुस्न पर लट्टू थे।

अगले रोज़ दरबार सज गया और मीर समेत बड़े शायर हाज़िर हुए। शेर-ओ-शायरी का दौर शुरू हुआ। मीर की मुहब्बत से खफा बादशाह ने हुक्म जारी कर महताब को दरबार में बुलवाया और मीर के ही शेरों और रेख्ताओं पर महताब से मुजरा करवाया। मुहब्बत की तौहीन मीर को बर्दास्त न हुई और वे दरबार से जाने लगे, बादशाह ने मीर को अपने पास बैठने और पूरा मुजरा देखने का हुक्म दिया। आशिक को हुक्म बर्दास्त न हुआ और मीर दरबार छोड़कर चले गए। बादशाह के हुक्म की नाफरमानी इससे पहले किसी ने न की थी। सल्तनत में हल्ला हो गया।

आशिकों पर किसका ज़ोर चला है जो बादशाह का चलता। बादशाह ने मीर को अकेले में समझाने-बुझाने की तरकीब से बुलावा भेजा। अगले रोज़ बादशाह के आरामखाने में मीर पहुंच गए। बातचीत शुरू हुई और माहौल गरमा गया।

बादशाह ने कहा- "महताब से तुम्हारी मुहब्बत ग़लत है ये, तुम तो आज भड़के आशिक़ हो। सिर्फ शायरी लिखना तुम्हारा पेशा है।"

इस पर मीर के जवाब सुन बादशाह आगबबूला हो गए। मीर अपने आशियाने लौट आये। रात में जब आसमान में चांद खिल रहा था तब मुहब्बत के आंगन का महताब बुझ गया। मीर दर्द में डूब गए, उन्हें चांद में महताब दिखने लगा।

Friday, 14 September 2018

मौत के मकां

मौत के मकां, खूब हैं यहां
देख लो देख लो खूब गौर से
आ रहे लोग यहां दूर दूर से
न है किसी को पता न किसी को खबर
कितनी रेत डाली है कितनी छोड़ी डगर
बिल्डर ने सारे नियम तोड़ डाले हैं
सीमेंट सरिया हल्की डाली, कच्चे ईंट डाले हैंमौत के मकां, poem
हम गए हम गए तुम भी पहुंच गए
बातों में आके बिल्डर को नोट दे दिए
सोच न सके कुछ भी सोच न सके
हमने एक लिया प्लॉट तुमने दो लिये

प्लॉट के नाम पे फ्लैट दे दिया 
बुरे फंसे बुरे फंसे हमको ठग लिया
मन मसोसकर फिर रहने चले गए
मकां सजा दिए पूजा भी कर दिए
रह रहे थे हम तो खूब शान से
अपने अपने घर में जो आलीशान थे
फिर नज़र लगी किसी कि दिन काला हो गया
जोर का शोर हुआ और गुबार छा गया
चारों ओर चारों ओर हर कोई रो पड़ा
आलीशां आलीशां मकां मेरा ढह गया

मौत आई मौत आई रूह कांप गई
गृहस्थी उजड़ गई ज़िन्दगी बिखर गई
भीड़ आई लोग आए जमघट भी लग गया
देखते देखते सपना वो थम गया
कुछ मरे कुछ दबे कुछ मिले भी नहीं
देखिए आज तो रोशनी भी काली हो गई
सब बिलख बिलख गये मुलाज़िम आ गया
पांच पांच लाख का ऐलान कर गया
मौत सस्ती देख के दिल ये रो गया
हाय हाय हाय क्या से क्या हो गया
जान गई माल गया वज़ूद भी चला गया
वो देखो वो देखो बिल्डर तो हंस रहा।


- रिज़वान नूर खान

Thursday, 13 September 2018

मुर्गे की दावत


गांव के बदलते स्वरूप को आलेख रूपी छोटी-छोटी यादों को समेटे रामधारी सिंह दिवाकर की 'जहां आपनो गांव' किताब हाल ही में साहित्य संसद प्रकाशन दिल्ली से छपकर आई है। किताब में बिहार के अररिया ज़िलें के गांवों का ज़िक्र किया गया है। वहां के हालातों, मजदूरों की मुश्किलों और उनके आधुनिक होने के साथ ही गांव-देहात की अच्छी-बुरी बातों का वर्णन है।

लेखक ने किताब की दूसरी कहानी में हनीफ चाचा को केंद्र में रखा है। हनीफ बुजुर्ग हैं, उनका कोई पक्का रोजगार नहीं है। एक तरह से मजदूर ही हैं। करीब तीन बीवियां और 18 बच्चों का कुनबा है। इसके अलावा कई मुर्गियां और बकरियां हैं। परिवार की जीविका मुश्किल से चलती है। मुर्गे-बकरियों की वजह से आये-दिन पड़ोसियों से कहासुनी होती है। कई बार मारपीट और ख़ूनमखून भी हो चुका है। जबकि कई लोगों से उनकी अच्छी पटती भी है।

हनीफ चाचा का मुर्गा सुबह से नहीं मिल रहा, अब शाम हो गई है। हनीफ और बाकी लोग जानते हैं कि मुर्गा पड़ोसी बनिये ने खुंदक निकलने के लिए पकड़कर छुपा लिया है। हितैषियों के कहने पर हनीफ चाचा थाने में शिकायत करने पहुंचे हैं। दरोगा ने चाचा को सुना, तम्बाकू थूकी और लार टपकाती आंखों से इशारा कर रुपये मांगे। चाचा बनिये को पिटवाना और मुर्गे को वापस पाना चाहते हैं तो कुर्ते की जेब से 20 का नोट निकालकर दे दिया।

बनिये को थाने में दांत-डपट के बाद चार-छै डंडे पड़े तो मुर्गा लाकर दरोगा को सौंप दिया। हनीफ चाचा को अब तसल्ली है। बनिये की बेइज्जती हो गई। थाने से छोड़ने के नाम पर दरोगा और दलालों को जेबें भी गरम हो गईं। तमाशा देखने वालों का मनोरंजन हो गया। हनीफ चाचा मुर्गा लेकर जाने लगे तो दरोगा ने घुड़क दिया और उसे काट-छीलकर लाने को कहा। शाम को थाने में मुर्गे की दावत उड़ी।

इस लड़ाई में न हनीफ चाचा को कुछ हासिल हुआ और न बनिये को कुछ मिला। बल्कि दूसरे-तीसरे लोग मलाई काट गए। करीब दो दशक पुरानी इस घटना ने आज और विस्तार पा लिया है। घूसखोरी और एक-दूसरे से जलने-कुढ़ने की आदत का कैनवास पहले कहीं ज्यादा बड़ा हो गया है।

लेखक रामधारी सिंह दिवाकर कई किताबें, कहानियां लिख चुके हैं। अररिया ज़िले के नरपतगंज गांव के रहने वाले हैं। मिथिला विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष पद से रिटायर हैं। उनकी यह किताब अभी पूरी पढ़ी नहीं है। पढ़ रहा हूं पर अभी तक जितनी पढ़ी है उससे कह सकता हूं कि किताब 'जहां आपनो गांव' में संकलित संस्मरण अच्छे हैं। इसे पढ़ा जाना चाहिए।

Sunday, 10 June 2018

बुंदेलखंड का सूखा

बुंदेलखंड हमेशा से कम बारिश वाला इलाका रहा है, लेकिन 2002 से लगातार सूखे ने मर्ज़ को तकरीबन लाइलाज बना दिया है.यह जमीनी बताती है कि बुंदेलखंड को ईमानदार कोशिशों की ज़रूरत है. साफ-सुथरी सरकारी मशीनरी अगर आम लोगों को साथ लेकर कोशिश करे तो सूखता जा रहा बुंदेलखंड शायद फिर जी उठे।


दिल्ली के पास वैशाली में तकरीबन नियमित रूप से एक रिक्शेवालेचेतराम से मेरी मुलाकात होती है जो अमूमन सफ़ेद कमीज़ और पाजामे में होता है। वही चेतराम मुझे एक रोज़ अपने घर के असबाब के साथ सड़क पर खड़ा मिल गया। उसकी झुग्गी उजाड़ दी गई थी। आनंद विहार, दिल्ली की सरहद है और एक सड़क इस केंद्रशासित प्रदेश को उत्तर प्रदेश से अलग करती है। इसी सड़क से थोड़ा और आगे जाएंगे तो वैशाली और इंदिरापुरम जैसी पॉशकॉलोनियां हैं।

वैशाली में, जहां मैं रहता हूं, आसपास अभी अनगिनत खाली प्लॉट हैं, जिनपर न जाने कितने लोग झुग्गियां बनाकर रहते हैं। वहां महागुनमेट्रो और शॉप्रिक्स जैसे चमचमाते मॉल्स हैं, जहां की दुनिया में पॉपकॉर्न जैसी चीज़ें मक्खन के साथ खाई जाती हैं, उससे थोड़ा आगे ही करोड़ों की कीमत वाले खाली प्लॉट्स पर झुग्गियों में न जाने कितनी ज़िंदगियां अपने अरबों-खरबों के सपनों को जीने लिए जाने कहां-कहां से आती हैं।

चेतराम भी उन्हीं में से एक हैं, जो उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड से पलायन करने को मजबूर हुए हैं। बिरादरी से दलित चेतराम पेट पालने के चक्कर में घर छोड़कर यहां किसी और की ज़मीन पर रहते हैं, जहां उनकी झुग्गी अवैध और गंदी बस्ती के रूप में गिनी जाती है।

ऐसी ही किसी गिनती को कम करने के लिए गाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण ने सभी खाली प्लॉटवालों को अपने प्लॉट पर निर्माण कार्य शुरू कराने का आदेश दिया, ऐसा न करने पर आवंटन रद्द कर दिया जाता। इसीलिए, चेतराम की झुग्गी उजाड़ दी गई। झुग्गी ही नहीं उजड़ी, उनका घर और उनकी दुनिया भी उजड़ गई। अब चेतराम और उसके गांव के उसके ही जैसे लोग, मकनपुर गांव में रहते हैं। वहां भी वो किसी खाली ज़मीन पर ही रहते हैं, जहां रोज़मर्रा की दिक्कतें हैं। पानी की, शौच की, सफ़ाई की, हर क़िस्म की दिक़्क़त।

चेतराम, बुंदेलखंड के अपने गांव गन्हौली से निकले तो अपने पीछे सात बीघा ज़मीन छोड़कर आए थे। वे बड़े शान से बताते हैं कि उनका इलाका बेमिसाल राजाओं का इलाक़ा रहा है। राजा परमार देव का ज़िक्र करते हुए चेतराम कहते हैं-बड़े लड़इयामहुबे वाले, इनकी मार सही न जाए। ठीक है कि इतिहास में महोबे के वीरों की मार बहुत भारी थी और उन्हें हराना कठिन था लेकिन आज की तारीख़ में पानी ने सबको त्रस्त करके रख दिया है।

चेतराम के इलाक़े में एक के बाद कई एक बरसों तक नियमति बारिश नहीं होने से खेती फ़ायदे का सौदा नहीं रह गया। सात बीघा ज़मीन को बटाई पर लगाकर, काम की तलाश में चेतराम सपरिवार दिल्ली आ गए। बटाई वाली ज़मीन से कुछ मिलता नहीं। दिल्ली में वे ख़ून-पसीना बहाते हुए रिक्शा चलाते हैं। लेकिन उनकी आंखों में गांव वापस जाने का सपना और उम्मीद भी ज़िंदा है।

केन नदी के किनारे ज़िंदगी उम्मीद के सहारे आगे बढ़ती है। शायद इसी ने ज़िंदा रखा था, गढ़ा गांव के प्रह्लाद सिंह को। बड़ी-बड़ी शानदार मूंछों वाले प्रह्लाद सिंह ने अपनी जवानी में किसी का क़त्ल कर दिया था। क़त्ल का जुर्म अदालत में साबित हो गया, 1962 में बांदा ज़िला अदालत ने उन्हें सज़ा-ए-मौत सुनाई। लेकिन, प्रह्लाद सिंह को राष्ट्रपति से जीवनदान मिला और उनकी सज़ा आजीवन कारावास में बदल दी गई।

प्रह्लाद सिंह ने दस साल जेल में काटे थे कि सन बहत्तर में नेकचलनी की वजह से उन्हें वक़्त से पहले रिहा कर दिया गया। प्रह्लाद, गांव लौटे तो नई उम्मीद के साथ ज़िंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश की। गृहस्थी की गाड़ी चल निकली। 

अभी एक दशक पहले तक सब कुछ ठीक-ठाक था। लेकिन परिवार बड़ा हुआ तो प्रह्लाद सिंह और उनके भाई ने मिलकर ट्रैक्टर के लिए बैंक से कर्ज़ ले लिया। इसी कर्ज़ ने उनके परिवार को बरबाद कर दिया। साल 2002 के बाद बुंदेलखंड का पूरा इलाक़ा लगातार सूखे की गिरफ़्त में आता गया। यह इलाक़ा पहले से ही कम बारिश वाला रहा है, लेकिन लगातार सूखे ने मर्ज़ को तकरीबन लाइलाज बना दिया। प्रह्लाद सिंह की खेती चौपट हो गई। आमदनी का ज़रिया जाता रहा। बैंकों को कर्ज़ दिए गए पैसे वापस चाहिए थे। 

यह बात और है कि यह बैंक सरकारी थे और इस देश में विजय माल्या जैसे कई उद्योगपति हैं जिन्होंने इन्हीं सरकारी बैंकों का पैसा दबा रखा है, और चुकाने के वक्त विदेश चले गए। यह बात भी और है कि देश के 6 हज़ार उद्योगपतियों ने बैंकों से सवा लाख करोड़ का कर्ज़ ले रखा है। उनमें से कोई आत्महत्या नहीं करता, न ही उन पैसों के लिए बैंक कभी हलकान होता है और उनके घर भाड़े के गुंडे भेजता है।

लेकिन गढ़ा गांव के किसान प्रह्लाद सिंह के घर बैंक ने भाड़े के गुंडे भेज दिए। वह साल 2007 था, जब किराए के गुंडों ने बैंक की तरफ़ से प्रह्लाद सिंह के ट्रैक्टर को कब्ज़े में ले लिया। ट्रैक्टर नीलाम कर दिया गया और उसके बाद बची बाक़ी की रकम की देनदारी की आख़िरी नोटिस भी निकाल दी गई।

जिन लोगों ने भारत के किसानों को ज़रा नज़दीक से देखा होगा, उन्हें इस बात का अंदाज़ा होगा कि एक किसान के लिए कितनी अहम होती है, उसकी साख, उसकी इज़्ज़त। खेत सूखे थे, कमाई का एक ज़रिया ट्रैक्टर था, वह भी चला गया। पहले तो प्रह्लाद सिंह के परेशान भाई और फिर उनके बेटे, बच्ची सिंह ने आत्महत्या कर ली। सयानी हो रही पोती मनोरमा चाहती थी कि वह अपने दादा को ब्याह के खर्च से बचाए। मनोरमा भी एक दिन डाई (बालों में लगाने वाला रंग) पीकर हमेशा के लिए सो गई। दिवंगत बेटे और पोती की तस्वीर दिखाते प्रह्लाद सिंह कहते हैं कि उन्होंने राष्ट्रपति से ऐसे बुढ़ापे के लिए क्षमादान नहीं मांगा था।

बुंदेलखंड का एक ख़ुद्दार किसान, कर्ज़ चुकाना तो चाहता है लेकिन प्रह्लाद सिंह जैसे किसानों की मजबूरी है कि जिस खेती पर उन्होंने अपनी ज़िंदगी गुज़ार दी, वह खेती आज उनके बीज तक वापस नहीं कर पा रही।  प्रह्लाद सिंह की यह कहानी पूरे बुंदेलखंड की सवा दो करोड़ की आबादी की कहानी से कमोबेश मिलती-जुलती है। प्रह्लाद सिंह की ही तरह बाक़ी लोगों की उम्मीदों की डोर टूटने लगी है। कर्ज़ एक तरह से गांव के लोगों के लिए जीने की शर्त बन गए हैं। लेकिन, ये शर्त जानलेवा है।
साभार- मंजीत ठाकुर की किताब 'बुंदेलखंड: बूंद चली पाताल' से।