Wednesday, 18 September 2019

पाकिस्‍तान से आए रामसे ब्रदर्स ने बॉलीवुड में चलाया भुतिहा सिनेमा, कोई नहीं दे सका टक्‍कर

बॉलीवुड में भुतिहा फिल्‍मों के जनक कहे जाने वाले रामसे ब्रदर्स को उनकी कम बजट की हॉरर फिल्‍मों के मामले में कोई भी निर्माता निर्देशक टक्‍कर नहीं दे पाया। विभाजन के बाद पाकिस्‍तान से सबकुछ छोड़कर आए रामसे ब्रदर्स ने अपनी मेहनत के बलबूते बॉलीवुड में सिक्‍का जमाया। सात भाइयों के ग्रुप रामसे बद्रर्स के श्‍याम रामसे का 18 सितंबर मंगलवार को बीमारी के बाद निधन हो गया। जबकि, एक एक भाई तुलसी कुमार की पिछले साल 2018 में मौत हो चुकी है। रामसे ब्रदर्स फिल्‍म वीराना, पुराना मंदिर, बंद दरवाजा जैसी सुपरहिट रहने वाली फिल्‍मों के लिए जाने जाते हैं।




तीन फिल्‍में फ्लॉप चौथी ने शोहरत दिलाई, सिनेमाघर हाउसफुल हो गए 
पाकिस्‍तान के कराची और लाहौर शहर में इलेक्‍ट्रॉनिक का बिजनेस करने वाले एफयू रामसे को विभाजन के दौरान पाकिस्‍तान छोड़ना पड़ा। पाकिस्‍तान में जमे जमाए काम के छूटने और भारत में आकर बस गए। मुंबई में रहते हुए उन्‍होंने लैमिंग्‍टन रोड पर इलेक्‍ट्रॉनिक का व्‍यापार शुरू किया। हिंदी सिनेमा के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए एफयू रामसे फिल्‍ममेकिंग में उतर गए। इस काम को स्‍टैब्लिश करने में उनके सात बेटों ने बड़ा रोल निभाया। 1954 में उन्‍होंने शहीद ए आजम भगत सिंह, 1963 में रुस्‍तम शोहराब और 1970 में एक नन्‍हीं मुन्‍ही लड़की जैसी फिल्‍मों का निर्माण किया। इन फिल्‍मों को बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी। 1971 में हॉरर फिल्‍म दो गज जमीन के नीचे को बड़ी सफलता हासिल हुई। आलम ये हुआ कि फिल्‍म रिलीज होते ही हाउसफुल हो गई और सिनेमाघर मालिकों को हाउसफुल के बोर्ड टांगने पड़ गए।



बॉलीवुड में भुतिहा फिल्‍मों की नींव रखी
एफयू रामसे के फिल्‍मों में उतरने के साथ ही उनके सभी 7 बेटे भी इंडस्‍ट्री में कूद पड़े और एक साथ मिलकर काम करना शुरू किया। उनके बेटों को बॉलीवुड में रामसे ब्रदर्स के नाम से पहचान मिलने लगी। तीन अच्‍छी कहानियों पर बनाई फिल्‍मों को फ्लॉप और भुतिहा फिल्‍म दो गज जमीन के नीचे को अपार सफलता मिलने के बाद रामसे ब्रदर्स ने दर्शकों की नब्‍ज पकड़ कर हॉरर जॉनर की फिल्‍मों को बनाना शुरू कर दिया। बॉलीवुड में जब फिल्‍मों को 40 से 50 लाख रुपये में बनाया जा रहा था तब रामसे ने सिर्फ 3.5 लाख रुपये में फिल्‍म दो गज जमीन के नीचे बनाकर मोटा रुपया कमा लिया था। उस वक्‍त तक बॉलीवुड में भुतिहा फिल्‍मों पर कोई भी प्रोड्यूसर पैसा लगाने के लिए राजी नहीं होता था। लेकिन रामसे ब्रदर्स ने बॉलीवुड में भुतिहा फिल्‍मों की नीव रखी।



70-80 के दशक में बॉक्‍स ऑफिस के बेताज बादशाह बने 
रामसे ब्रदर्स ने हॉरर फिल्‍मों पर काम जारी रखा और 1980 में दूसरी हॉरर फिल्‍म गेस्‍ट हाउस को पर्दे पर लेकर आए, जिसे खूब पसंद किया गया। बॉलीवुड में हॉरर फिल्‍मों के चलन को शुरू किया और इसे मशहूर भी किया था। 1970 से 1980 के बीच रामसे ब्रदर्स ने दर्जनों हॉरर फिल्‍में बनाईं, जिन्‍हें दर्शकों ने खूब पसंद किया। इसके बाद  वीराना, पुराना मंदिर, पुरानी हवेली, दरवाजा, बंद दरवाजा समेत 30 से ज्‍यादा हॉरर फिल्‍मों को सिनेमाघरों में उतारा। खास बात ये रही कि इन सभी फिल्‍मों ने जबरदस्‍त कमाई की और सुपरहिट श्रेणी में शामिल हो गईं। रामसे ब्रदर्स की आखिरी फिल्‍म 'कोई है' 2107 में आई थी।  7 साल तक धुआंधार चलने वाली टीवी सीरीज जी हॉरर शो के लिए मशहूर हुए श्‍याम रामसे और तुलसी कुमार ने मिलकर इसे बनाया था। श्‍याम रामसे के भाई तुलसी कुमार की 2018 में मौत हो गई। इसके बाद मंगलवार 18 सितंबर को रामसे भाइयों में एक और मुखिया श्‍याम रामसे की मुंबई के एक अस्‍पताल में मौत हो गई।..NEXT


जानिए: मुहर्रम में क्‍यों निकलते हैं ताजिया, कौन था यजीद और किसने किया था इमाम हुसैन का कत्‍ल

कई हजार ईसा पूर्व पैदा हुये अजूबे

पाकिस्‍तान से आए रामसे ब्रदर्स ने बॉलीवुड में चलाया भुतिहा सिनेमा, कोई नहीं दे सका टक्‍कर

Tuesday, 10 September 2019

जानिए: मुहर्रम में क्‍यों निकलते हैं ताजिया, कौन था यजीद और किसने किया था इमाम हुसैन का कत्‍ल


इस्‍लाम धर्म को मानने वालों के लिए मोहर्रम शहादत का महीना माना जाता है। मोहर्रम की 10वीं तारीख को पूरी दुनिया के मुस्लिम इमाम हुसैन की याद में ताजिया और जुलूस निकालते हैं। धार्मिक मान्‍यता केतहत इस महीने में किसी भी तरह के शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं।

इस्‍लामिक नववर्ष का पहला माह शोक का 
मोहर्रम की शुरुआत से ही इस्‍लामिक कैलेंडर की शुरुआत मानी जाती है। मोहर्रम माह की 10वीं तारीख को पैगंबर मोहम्‍मद साहब के नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों को कत्‍ल किए जाने से इस माह को शोक के तौर पर जाना जाता है। इस दौरान किसी भी तरह के शुभ कार्यों से बचा जाता है। इस्‍लामिक कैलेंडर में कुल 12 महीने होते हैं। दूसरे महीने को सफर और अंतिम महीने को जुअल हज्‍जा के नाम से जाना जाता है। रमजान का महीना इस्‍लामिक कैलेंडर का सबसे पाक और महत्‍वपूर्ण महीना माना जाता है।


क्रूर यजीद ने विरोधियों को गुलाम बनाया 
मुस्लिम विद्वानों के मुताबिक इस्‍लाम धर्म के पैगंबर मोहम्‍मद साहब के इस दुनिया से परदा करने के बाद उनके अनुयायियों ने सबकुछ संभाल लिया। इस बीच मदीना शहर के पास स्थित 'शाम' जगह जो कि मुआविया शासक के अधीन थी। मुआविया अरब देशों का राजा था। अचानक उसकी मौत के बाद यजीद ने सत्‍ता हथिया ली और खुद को खुदा मानने के लिए लोगों पर दबाव बनाने लगा।

वह चाहता था कि इमाम हुसैन भी उसकी सत्‍ता को स्‍वीकार कर लें तो वह पूरी दुनिया का राजा बन जाएगा। यजीद बेहद क्रूर और जालिम था, उसमें जुआ, शराब समेत सभी तरह के ऐब भरे हुए थे। कुछ लोगों ने उसके डर से उसका कहा मान लिया। इमाम हुसैन और उनके लोगों ने उस धूर्त यजीद की सत्‍ता स्‍वीकार नही की और मदीना शहर में कत्‍लेआम न हो इसलिए शहर छोड़कर इराक की ओर चल पड़े।



करबला का भयंकर युद्ध

मुस्लिम विद्वानों के मुताबिक इमाम हुसैन ने अपने 72 साथियों के साथ मदीना शहर छोड़ दिया और इराक की ओर चल पड़े। इस दौरान उनके साथ छोटे बच्‍चे और महिलाएं भी थीं। जब इमाम हुसैन का लश्‍कर करबला पहुंचा तो यहां पर यजीद की सेना ने उन्‍हें घेर लिया और रसद, पानी का रास्‍ता रोक दिया। यजीद की सेना के साथ 10 दिनों तक इमाम हुसैन के लश्‍कर ने युद्ध लड़ा।


हर दिन इमाम के लश्‍कर का एक योद्धा मैदान में पहुंचता और यजीद की सेना के पैर उखाड़ देता। भूखे प्‍यासे इमाम हुसैन के 72 साथियों को धीरे-धीरे यजीद के सैनिकों ने धोखा देकर कत्‍ल कर दिया। मोहर्रम की 10 तारीख को इमाम हुसैन को भी यजीद ने कत्‍ल कर दिया। युद्ध के दौरान मात्र 6 महीने के असगर अली को भी शहीद कर दिया गया। इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत की याद में दुनियाभर में शोक मनाया जाता है और मोहर्रम की 10 तारीख को ताजिया और जुलूस निकाले जाते हैं।

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Thursday, 29 August 2019

बच्‍चा चोर : अफवाह या सच

बच्‍चा चोर : अफवाह या सच 

इन दिनों मेरे शहर कानपुर में बच्‍चा चोरी की अफवाह बहुत तेजी से फैल रही है। कुछ समय पहले उत्‍तर प्रदेश में ऐसी अफवाह फैली कि जो भी रात में सोया तो वह पत्‍थर का बन जाएगा। लाखों लोगों तक पहुंची इस सूचना के चलते लोग रात भर जागते रहे।

इसी तरह 2012 में दुनिया के ख़तम होने की अफवाह फैली। कानपुर समेत कई इलाकों में मुहनुच्वा, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब में कलाबंदर की अफवाह, चोटी कटवा समेत कई तरह की अफवाहों को देशभर में फैलते देखा गया। अब बच्चा चोर की अफवाह महाराष्ट्र के कई शहरों से होते हुए राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीगढ़ के बाद यूपी के कानपुर, फतेहपुर, हमीरपुर, उन्नाव, कानपुर देहात समेत कई शहरों में फैल चुकी है।


इन अफवाहों में शेयर की जाने वाली तस्वीरें, वीडियो, आंकड़े और सूचना झूठी और गलत होती है। ऐसी अफवाहों को सच साबित करने के लिए कुछ ऐसे वीडियो शेयर किए जाते हैं, जिनमें आरोपी को पीटा गया होता है और वह बदहवासी की हालत में होता है। इस स्थिति में भीड़ के कुछ लोग उसे आरोपी बता रहे होते हैं। आरोपी को भीड़ बोलने ही नहीं देती और उसे लगातार पीटा जा रहा होता है। ऐसे में आप भीड़ की बात को सही मान लेते हैं।

अफवाह की सामग्री में कुछ फोटोशॉप की गई तस्‍वीरें होती हैं। जो असल में किसी दूसरे देश या जगह में कभी किसी दुर्घटना, हादसे, दंगे की होती हैं। इनको अफवाह के साथ की घटना का अंश बता दिया जाता है। कुछ तस्‍वीरों में किसी शख्‍स की आवाज भी सुनाई दे रही होती है जो उसे संबंधित घटना के साथ जोड़ते हुए सही बता रहा होता है।

कई मामलों में वीडियो किसी दूसरे देश, जगह, घटना, के होते हैं, जिन्‍हें वर्तमान अफवाह के साथ जोड़ कर दिखाया जाता है। कुछ अफवाह सामग्री में टेक्‍स्‍ट मैटर और आंकड़े भी लिखे होते हैं जो गलत होते हैं। वाट्सएप के जरिए लोगों तक एक साथ ऐसी सामग्री पहुंचती है तो वह उसे सही मान लेते हैं।

किसी भी तस्‍वीर, वीडियो या वाइस ओवर या बयान में पुख्‍ता जानकारी नहीं दी जाती है। जैसे, वह तस्‍वीर किस शहर, समय और मामले की है। तस्‍वीर में दिख रहे लोग कौन हैं, उनका नाम पता क्‍या है। तस्‍वीरों में दिखने वाली पुलिस किस शहर की है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि पुख्‍ता जानकारी मिलने पर आप उसे सर्च करके जांच लेंगे और मामले को पहचान जाएंगे कि यह तो झूठ है।

जानकार लोग बताते हैं कि इस तरह की अफवाहों के जरिए लोगों को डराने, भड़काने, द्वेष, नफ़रत फैलाने और लोगों को एक तरह की सोच बनाने के इरादे से किया जाता है। इन अफवाहों के कारण लोग आक्रामक हो जाते हैं और बिना सच्‍चाई जाने आरोपी को पीटने और मार डालने पर आमादा हो जाते हैं। यहां तक कि उस व्‍यक्ति की हत्‍या कर देते हैं। इस तरह के वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर तैरते दिख जाते हैं।

अफवाह के जरिए एक भीड़ को तैयार किया जाता है जो किसी को भी पीटने, हत्या करने को तैयार रहती है। आप इस हत्यारी भीड़ का हिस्सा ना बनें। अगर कोई ऐसी घटना सामने आती है तो जो भी लोग आरोपी हैं उन्हें मारने की बजाय पकड़कर रखें, पूछताछ करें और संबंधित पुलिस को तत्काल सूचना दें, खुद ही हत्यारे न बनें।

इस तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें। हां, अपने बच्चों की सुरक्षा के मद्देनजर अभिभावकों को सतर्क रहने की जरूरत है। वह बच्चों के स्कूल, खेलने की जगहों, उनके आने जाने वाले रास्तों पर निगरानी जरूर रखें।

Monday, 1 April 2019

एमएस धोनी से लगान तक क्रिकेट पर खूब बनी फिल्‍में, कई ने रिकॉर्ड तोड़े

रिजवान नूर खान 
इन दिनों खेलप्रेमी आईपीएल की खुमारी में डूबे हैं। हालात ये हैं कि कई शहरों में शाम को क्रिकेट मैच शुरू होते ही सड़कों पर सन्‍नाटा होने लगता है। रविवार को दो मैच होने के चलते कई जगह तो खेलप्रेमी काम जल्‍द खत्‍म कर टीवी के सामने बैठ जाते हैं। लोगों के बीच क्रिकेट की इस दीवानगी को भुनाने में बॉलीवुड कभी पीछे नहीं रहा है। अब तक क्रिकेट पर केंद्रित कई फिल्‍में आ चुकी हैं और ज्‍यादातर फिल्‍में हिट रही हैं। कई ने तो कीर्तिमान गढ़े हैं। कुछ फिल्‍मों के सीक्‍वल भी आने वाले हैं। आज हम ऐसी ही टॉप फिल्‍मों के बारे में आपको बताएंगे।

एमएस धोनी : द अनटोल्‍ड स्‍टोरी

क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी के जीवन पर केंद्रित फिल्‍म एमएस धोनी: द अनटोल्‍ड स्‍टोरी बेहद लोकप्रिय साबित हुई। साल 2016 में रिलीज हुई ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त हिट रही थी। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 216 करोड़ रुपये कमाई की थी। नीरज पांडेय द्वारा निर्देशित इस फिल्‍म में सुशांत राजपूत ने एमएस धोनी का किरदार निभाया है। इस फिल्म के गाने भी खासे सुपरहिट रहे थे। खबरों के मुताबिक इस फिल्‍म का सीक्वल भी जल्‍द आने वाला है।


लगान

लगान आशुतोष गोवरिकर की मास्‍टरपीस फिल्‍म मानी जाती है। क्रिकेट पर केंद्रित यह फिल्‍म बेहद लोकप्रिय हुई और बॉक्‍स ऑफिस के कई रिकॉर्ड तोड़ दिए। फिल्‍म में आजादी से पहले का घटनाक्रम दिखाया गया है। दोगुना लगान माफ कराने के लिए किसान अंग्रेजों से क्रिकेट मैच खेलते हैं। किसानों के क्रिकेट सीखने से लेकर अंग्रेजों से मैच जीतने के संघर्ष की यह कहानी सिनेमाप्रेमी खूब पसंद करते हैं। इस फिल्‍म ने बॉक्‍स ऑफिस समेत लोकप्रियता में झंडे गाड़ दिए। आमिर खान और ग्रेसी सिंह ने मुख्‍य भूमिकाएं निभाईं। ग्रेसी सिंह की यह डेब्‍यू फिल्‍म थी।


इकबाल

इकबाल फिल्‍म क्रिकेटर बनने का सपना पालने वाले एक गूंगे युवक के संघर्ष पर केंद्रित है। श्रेयस तलपड़े का किरदार इकबाल में क्रिकेट का गजब टैलेंट है। वह भारतीय टीम में तेज गेंदबाज की भूमिका में क्रिकेट खेलने की इच्‍छा रखता है। गूंगा होने की वजह से इकबाल के पिता उसके इस शौक से गुस्‍सा रहते हैं। हालांकि, इकबाल की छोटी बहन उसे क्रिकेटर बनने में हरसंभव मदद करती। भारतीय टीम का हिस्‍सा बनने के लिए इकबाल के संघर्ष को इस फिल्‍म में बखूबी पेश किया गया है। 2005 में रिलीज हुई इस फिल्‍म का निर्देशन और लेखन और नागेश कुकुनूर ने किया है। श्रेयस तलपड़े, नसीरुद्दीन शाह, गिरीश करनाड आदि ने फिल्‍म में मुख्‍य किरदार निभाए हैं। 



जन्‍नत

क्रिकेट में होने वाली सट्टेबाजी पर केंद्रित यह फिल्‍म इमरान हाशिमी की हिट फिल्‍मों में शुमार है। फिल्‍म की कहानी में इमरान हाशिमी का किरदार अपराध की दुनिया में लिप्‍त है। उसमें क्रिकेट मैच के दौरान कब क्‍या होने वाला है इसका आभास होने की खूबी है। अपने इस हुनर के बल पर वह बुकी बन जाता है। धीरे धीरे वह क्रिकेट में सट्टेबाजी के खेल में गहरे तक पहुंच जाता है। क्रिकेट के काले हिस्‍से को बयान करती इस फिल्‍म के गाने दर्शकों को खूब पसंद आए थे। इस फिल्‍म की सफलता के बाद इसका सीक्‍वल भी बनाया गया।

विक्‍ट्री

इस फिल्‍म के जरिए निर्देशक ने यह बताने की कोशिश की है कि किस तरह से सफलता का घमंड आदमी को मिट्टी में मिला देता है। हरमन बावेजा इस फिल्‍म में मुख्‍य किरदार में हैं। वह एक गांव के युवा हैं जो बड़ा क्रिकेटर बनने का सपना पालता है। भारतीय टीम का हिस्‍सा बनने के बाद सफलता उसके कदम चूमती है। इस सफलता का उसे अहंकार हो जाता है और वह मुश्किल दिनों में साथ देने वालों को भूल जाता है। धीरे-धीरे उसका प्रदर्शन गिरने लगता है और वह भारतीय क्रिकेट टीम से बाहर कर दिया जाता है। यह फिल्‍म बॉक्‍स आफिस बहुत कमाल नहीं कर सकी थी।


इन फिल्‍मों का कथानक भी क्रिकेट रहा

इन फिल्‍मों के अलावा क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर पर बनी बायोपिक और क्रिकेटर अजहरुद्दीन पर बनी अजहर फिल्‍म भी खूब चर्चा में रही। किक्रेट बैकड्रॉप पर बनी फिल्‍म काय पोचे, दिल बोले हडिप्‍पा, हैट्रिक, पटियाला हाउस, से सलाम इंडिया, अव्‍वल नंबर समेत कई ऐसी फिल्‍में रिलीज हुईं, जिनका बैकग्राउंड क्रिकेट पर केंद्रित रहा। 

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Monday, 25 March 2019

दलित और मुस्लिम देते हैं सहारनपुर लोकसभा सीट को सहारा


रिजवान नूर खान 

सहारनपुर संसदीय सीट पर लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया सोमवार 18 मार्च को शुरू हो गई। इसके साथ ही सहारनपुर लोकसभा क्षेत्र में राजनीतिक सरगर्मी भीअपने चरम पर पहुंच गई है। यह सीट कई मायनों में सभी राजनीतिक दलों के लिए अहम है। पहले चरण में 11 अप्रैल को इस निर्वाचन क्षेत्र में मतदान होना है। संभावित प्रत्याशियों ने लोगों को लुभाने के लिए वादों का जाल फेंकना शुरू कर दिया है। ऐसे में यहां सभी प्रमुख दलों ने अपनी जीत पक्की करने के लिए कमर कस ली है। आइए जानते हैं पहले लोकसभा चुनाव से लेकर अबतक सहारनपुर लोकसभा के राजनीति सफर के बारे में-  


इस लिंक पर पढ़े विश्‍लेषण....


सबसे ज्यादा पांच बार राशीद बने सांसद

सहारनपुर लोकसभा सीट पहले लोकसभा चुनाव से ही कांग्रेस का गढ़ बन गई। यहां 1952 से 1971 तक लगातार चार लोकसभा चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशियों ने विजयी पताका फहराया। कांग्रेस के इस विजय अभियान को जनता पार्टी सेक्यूलर के नेता राशीद मसूद ने रोका। इस लोकसभा क्षेत्र से सबसे ज्यादा पांच बार राशीद मसूद सांसद चुने गए। खास बात यह रही कि वह चार बार पार्टी बदलकर चुनाव लड़े और जीते। इस लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी को सिर्फ एक बार ही जीत का स्वाद चखने को मिला है, जबकि बहुजन समाज पार्टी दो बार यहां से जीती है और भाजपा तीन बार इस सीट पर विजेता बनी है।

दूसरे लोकसभा चुनाव में मिला स्वतंत्र सीट का नाम

दलित और मुस्लिम बाहुल्य यह क्षेत्र 1951 में हुए पहले लोकसभा चुनाव के दौरान दो लोकसभा क्षेत्रों में बंट गया था। इस क्षेत्र का एक हिस्सा देहरादून जिला और बिजनौर उत्तर-पूर्व लोकसभा सीट का हिस्सा था, जबकि दूसरे हिस्‍से का नाम सहारनपुर पश्चिम और मुजफ्फरनगर उत्तर लोकसभा सीट था।1957 में हुए लोकसभा चुनाव से पहले इस निर्वाचन क्षेत्र को दोबारा गठित कर सहारनपुर लोकसभा का नाम दिया गया। 1957 में दूसरी लोकसभा के चुनाव में इस क्षेत्र से कांग्रेस ने अजीत प्रसाद जैन और सुंदरलाल को चुनाव लड़ाया था। अजीत प्रसाद को 202081 लाख वोट मिले, जबकि सुंदर लाल को 161181 लाख वोट मिले। दोनों उम्मीदवारों को विजेता घोषित किया गया। गौरतलब है कि संभवत: उस वक्त लोकसभा क्षेत्र का आकार बड़ा होने के चलते दो विजेता घोषित किए गए थे और यह स्थिति देश के 40 से अधिक लोकसभा क्षेत्रों की थी। इस सीट पर निर्दलीय लड़े अख्तर हसन ख्वा़जा 138996 लाख वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे थे।

जब पांच लाख वोटों से जीती थी कांग्रेस

1962 में सहारनपुर लोकसभा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी। कांग्रेस की लहर में इस निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर लड़े सुंदर लाल ने 104709 लाख वोट हासिल करकेजीत दर्ज की। उन्होंने जनसंघ के ममराज को पांच लाख से ज्यादा वोटों के अंतर सेहराया था। इसी तरह 1967 के चुनाव में भी कांग्रेस से लड़े सुंदर लाल ने 120891 लाख वोट हासिल कर जीत दर्ज की। सम्युक्त सोशलिस्‍टपार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे एस सिंह 83239 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे। कांग्रेस की जीत का यह सिलसिला 1971 में भी चला। 1977 में छठी लोकसभा के लिए हुए मतदान में यहां कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस की लहर यहां थम गई। भारतीय लोकदल के उम्मीदवार राशीद मसूद ने कांग्रेस प्रत्याशी जाहिद हसन को करारी शिकस्त दी। राशीद मसूद सातवीं लोकसभा के लिए 1980 में भी सहारनपुर से सांसद चुने गए। वह जनता पार्टी सेक्यूलर के टिकट पर चुनाव लड़े थे।

दो बार की हार के बाद जीती कांग्रेस

1984 में कांग्रेस ने सहारनपुर सीट पर पलटी मारी और दो बार की हार के बाद जीत हासिल की। कांग्रेस के यशपाल सिंह को 277339 लाख वोट मिले,  जबकि भारतीय लोकदल प्रत्याशी राशीद मसूद को 204730 लाख वोट हासिल हुए। इसके बाद 1989 और 1991 के लोकसभा चुनाव में राशीद मसूद जनता दल प्रत्याशी बने और जीत हासिल की। कांग्रेस दोनों बार यहां दूसरे नंबर पर आई। इस बीच भाजपा नेदेश की राजनीति में बढ़त बनाते हुए 1996 और 1998 में सहारनपुर सीट को अपने नाम कर किया।

1999 में बसपा ने दर्ज की जीत

1999 में 13वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में सहारनपुर सीट पर बसपा ने जीत हासिल की। यहां रालोद के राशीद मसूद ने बसपा उम्मीबदवार को कड़ी टक्कर दी। उन्हें 213352 लाख वोट मिले, जबकि विजेता बसपा प्रत्याशी मंसूर अली खान को 235659 लाख वोट मिले। कई दल बदलने वाले राशीद मसूद ने 2004 का लोकसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर लड़ा और जीत हासिल की। राशीद को बसपा प्रत्याशी मंसूर अली खान ने कड़ी टक्कर दी। राशीद को 353271 लाख वोट मिले, जबकि मंसूर को 326441 लाख वोट प्राप्त हुए। 15वीं लोकसभा के लिए 2009 में सहारनपुर सीट पर बसपा ने कब्जा जमाया। उसके प्रत्याशी जगदीश सिंह राणा को354807 लाख वोट पाए, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी सपा नेता राशीद मसूद को 269934 लाख वोट मिले।

16 साल बाद भाजपा को मिली जीत

16वीं लोकसभा के लिए 2014 के चुनाव में मोदी लहर का असर रहा और सहारनपुर सीट पर भाजपा को 16 साल बाद जीत नसीब हुई। इससे पहले भाजपा 1998 में इस सीट से चुनाव जीती थी। 2014 में भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल को 472999 लाख वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस नेता इमरान मसूद को 407909 लाख वोट हासिल हुए।

राजा सहारन पीर ने बसाया था सहारनपुर

सहारनपुर की स्थापना 1340 के आसपास हुई और इसका नाम एक राजा सहारन पीर के नाम पर पड़ा। सहारनपुर की काष्ठ कला और देवबन्द दारूल उलूम विश्वपटल पर सहारनपुर को अलग पहचान दिलाते हैं। सहारनपुर में प्राचीन शाकुम्भरी देवी सिद्धपीठ मंदिर, इस्लामिक शिक्षा का केन्द्र देवबन्द दारूल उलूम, देवबंद का मां बाला सुंदरी मंदिर, नगर में भूतेश्वर महादेव मंदिर औरकम्पनी बाग इसके प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। लकड़ी पर नक्काशी करने का काम सहारनपुर में काफी अधिक होता है। लखनऊ से इसकी दूरी 702.6 किलोमीटर और दिल्ली से करीब 200 किलोमीटर है।

Thursday, 21 March 2019

लोकसभा चुनाव 2019: जाट और मुस्लिम तय करते हैं कैराना की किस्मत, इस बार करारा संघर्ष

रिजवान नूर खान 

कैराना संसदीय सीट के लिए 18 मार्च (सोमवार) से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। परंपरागत रूप से रालोद के लिए खास रही इस सीट पर इस बार भी कांटे का मुकाबला है। मुस्लिम और जाट बाहुल्यस इस निर्वाचन क्षेत्र में राजनीतिक दलों का जातीय समीकरण बैठाने का गणित जनता अक्सलरगलत साबित करती रही है। यही वजह है कि 2014 में यहां से जीते भाजपा के हुकुम देव सिंह के निधन के बाद हुए उपचुनाव में रालोद की प्रत्याशी तबस्सुम हसन ने भाजपा को शिकस्त  दे दी। यहां हम कैराना लोकसभा क्षेत्र की पूरी चुनावी और राजनीतिक तस्वीतर आपके सामने पेश कर रहे हैं-

आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा के साथ हुए चुनावी गठबंधन में रालोद के हिस्सें में यह सीट गई है। यहां पहले चरण में 11 अप्रैल को मतदान होना है।


दो बार से अधिक नहीं मिली किसी को जीत

कैराना लोकसभा सीट का इतिहास रहा है कि यहां पर कोई भी दल दो बार से ज्यादा लगातार जीत हासिल नहीं कर सका है। मुस्लिम और जाट बाहुल्य इस निर्वाचन क्षेत्र में राजनीतिक दलों का जातीय समीकरण बैठाने का गणित जनता अक्सर गलत साबित करती रही है। ऐसा इसलिए क्यों कि इस सीट पर किसी भी दल का कभी भी वर्चस्व नहीं रहा है। यहां की जनता हर बार परिवर्तन कर काबिज दल को बाहर कर देती है। यह सिलसिला पहले लोकसभा चुनाव से चला आ रहा है। यहां पर कांग्रेस की लहर के बावजूद पहले लोकसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी ने भारी मतों से जीत हासिल कर कांग्रेस को हराया था। बाद में यहां जनता दल के प्रत्याशी ने लगातार दो बार 1989 और 1991 में जीत हासिल की, लेकिन तीसरी बार वह जीत नहीं सके। इसी तरह यह कारनामा अजीत सिंह चौधरी की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल ने 1999 और 2004 में कर दिखाया, लेकिन वह भी तीसरी बार लगातार जीत हासिल नहीं कर सके। अब तक भाजपा, बसपा और सपा, जनता पार्टी सेक्युलर ने इस लोकसभा सीट पर सिर्फ एक-एक बार ही जीत दर्ज की है।

 

जब नहीं चली कांग्रेस की लहर, निर्दलीय ने चटाई धूल 

देश के लिए तीसरी बार हुए लोकसभा चुनाव के दौरान अस्तित्व में आई कैराना लोकसभा सीट जाट और मुस्लिम समुदाय बाहुल्य होने के चलते कड़े चुनावी मुकाबलों की गवाह रही है। 1962 में जब देश भर में कांग्रेस की लहर चल रही थी, तब यहां से कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी। 1962 में पहली बार इस लोकसभा सीट पर हुए मतदान में निर्दलीय उम्मीदवार यशपाल सिंह ने उस समय देश की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस के दिग्गज नेता अजीत प्रसाद जैन को हराया था। यशपाल को 134574 लाख वोट मिले, जबकि अजीत को 81140 वोट मिल थे। गौरतलब है कि अजीत प्रसाद जैन 1951 में सहारनपुर लोकसभा सीट से सांसद रह चुके थे।

1967 में जातीय समीकरण ने खिलाया गुल 

1967 में जब चौथी लोकसभा के गठन के लिए चुनाव कराए गए, तब कैराना सीट पर दूसरी बार संसदीय चुनाव हुआ। देश भर में वर्चस्व कायम रखने वाली कांग्रेस ने एक बार फिर यहां से अजीत प्रसाद जैन को चुनाव मैदान में उतारा। उनके सामने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने जीए खान को प्रत्याशी बनाया। दोनों नेताओं के बीच कड़ा संघर्ष हुआ। जीए खान ने 76415 वोट पाकर जीत हासिल की। अजीत को 74750 वोट मिले। दोनों के बीच हार का अंतर दो हजार से भी कम वोटों का रहा। 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर चुनावी मैदान में ताल ठोकी और जातीय समीकरण का लाभ लेने के लिए मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट थमाया। इसका नतीजा भी कांग्रेस के लिए खुशियां लेकर आया। कांग्रेस उम्मीदवार शफकत जंग ने 162276 लाख वोट हासिल किए, जबकि भारतीय क्रांति दल के प्रत्याशी गयूर अलीखान को 89510 वोट के साथ हार का सामना करना पड़ा।

आपातकाल ने कांग्रेस को दिया था जोर का झटका

कैराना सीट पर 1977 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए बेहद खराब रहा। यहां से तत्कालीन सांसद शफकत जंग अपनी सीट नहीं बचा सके। उन्हें लोकदल के प्रत्याशी चंदन सिंह ने करारी शिकस्त दी। चंदन को 242500 लाख वोट हासिल हुए, जबकि कांग्रेस के शफकत को 95642 वोट ही मिले। 1980 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी सेक्यूलर की नेता गायत्री देवी ने 203242 लाख वोटों के साथ विजेता बनीं। कांग्रेस इंदिरा के प्रत्याशी नारायण सिंह 143761 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे। 1984 के संसदीय चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की। कांग्रेस प्रत्याशी अख्तर हसन 236904 वोटों के साथ विजेता बने। लोकदल प्रत्याशी श्याम सिंह 138355 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे।

1989 में जनता दल ने की फतह 

1989 का लोकसभा चुनाव इस सीट से जनता दल प्रत्याशी हरपाल सिंह ने 306119 लाख वोटों के साथ जीता। प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस नेता बशीर अहमद 184290 लाख वोट पाकर हार गए। जनता दल ने 1991 का चुनाव भी इस सीट से अपने नाम किया। हालांकि1996 में कैराना सीट पर समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की। इस बार सपा नेता मुनव्वर हसन ने 184636 लाख मत पाकर जीत दर्ज की,जबकि दूसरे नंबर पर रहे भाजपा नेता उदयवीर सिंह को 174614 मतों से ही संतोष करना पड़ा। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी और एलके आडवाणी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में भाजपा की लहर चली। इस तरह दो बार से हार का सामना कर रही भाजपा ने कैराना सीट अपने नाम की। यहां से उसके प्रत्याशी वीरेंद्र वर्मा के जीत मिली और सपा नेता मुनव्वर हसन को हार का सामना करना पड़ा।

इस बार रालोद ने भाजपा से लिया बदला 

1999 में 13वीं लोकसभा के लिए हुए मतदान में कैराना लोकसभा क्षेत्र की जनता ने राष्ट्रीय लोकदल पर विश्वास जताया और उसके प्रत्याशी आमिर आलम 206345 लाख वोट पाकर विजेता बने। दूसरे नंबर पर यहां से बीजेपी के निरंजन सिंह मलिक रहे। 2004 के लोकसभा चुनाव में भी राष्ट्रीय लोकदल ने अपना जादू कायम रखा और उसकी अनुराधा शर्मा को भारी मतों से जीत मिली। रालोद की जीत का यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका। 2009 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने सेंध लगाते हुए सीट रालोद से यह सीट हथिया ली। बसपा प्रत्यााशी तबस्सुम बेगम ने 283259 लाख वोट पाकर विजेता बनीं। दूसरे नंबर पर 124802 लाख वोट पाकर सपा नेता साजन मसूद रहे। कांग्रेस तीसरा और भाजपा को चौथा स्थान हासिल हुआ। 2014 में भाजपा ने यहां पलटी मारी और कैराना लोकसभा सीट पर कब्जा जमाया। यहां से भाजपा नेता हुकुम देव सिंह ने भारी मतों से जी‍त हासिल की। उनका असमय निधन होने के बाद यहां हुए उप चुनाव में भाजपा ने यह सीट गंवा दी। यहां से सपा और रालोद की गठबंधन प्रत्या शी तबस्सुम हसन ने फिर जीत हासिल की।

कर्णपुरी के नाम से जाना जाता था कैराना  

कैराना उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। कैराना प्राचीन काल में कर्णपुरी के नाम से जाना जाता था, जो बाद में बिगड़कर किराना नाम से जाना गया और फिर कैराना हो गया। मुजफ़्फ़रनगर से करीब 50 किलोमीटर पश्चिम में हरियाणा पानीपत से सटा यमुना नदी के पास बसा कैराना राजनीतिक पार्टी राष्ट्रीय लोकदल का घर भी माना जाता है। यहां मुस्लिम और जाट मतदाताओं की संख्या अधिक है। हालांकि यह जातिगत आंकड़ा हर बार एक जैसा चुनावी फैसले नहीं करता है। इस लोकसभा क्षेत्र के तहत पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से कैराना की दूरी करीब 103 किलोमीटर है।

इस आर्टिकल को दैनिक जागरण की वेबसाइट पर भी पढ़ा जा सकता है। लिंक ये रहा.....
https://www.jagran.com/elections/lok-sabha-lok-sabha-election-2019-know-everything-about-kairana-lok-sabha-seat-19061340.html

Thursday, 17 January 2019

बकरी और अबरार का दर्द

बकरियां बुरी तरह डरी हुई हैं। अभी रात के दो बज रहे हैं। उनके शोर से घर के सभी लोग जग गए हैं। मुहल्ले में भी जनसर हो गई। पहले बड़ी वाली बकरी ही चिल्ला रही थी, धीरे धीरे पांचों बकरियां शोर करने लगीं। मैं इस्माइल के घर में हूं। उसके घर के बरोठे का ये नजारा वाकई में सबके लिए चौकाने वाला है। लेकिन कोई समझ कुछ नहीं पा रहा है। उसके अब्बा (बाबा) जग तो गए हैं लेकिन मच्छरदानी से बाहर नहीं निकलना चाहते। दरअसल बरोठे में जहां बकरियां बंधीं हैं वहां मच्छर कुछ ज्यादा हैं। वे चारपाई से ही सबको हांक रहे हैं, सब अपने-अपने घर जाओ, भीड़ मत बढ़ाओ। बकरियां अपने आप चुप हो जाएंगी। उनकी ऐसी बेरुखी से कुछ लोग जा चुके हैं, कुछ जा रहे हैं।

बकरियों का यूं चिल्लाना अबरार से सहन नहीं हो रहा। इससे पहले उसने अपनी बकरियों को यूं सहमते नहीं देखा। वही तो है जो बकरियों को खेतों में चराने ले जाता है। वह आठ साल का है। बकरियां उसे बहुत प्यारी हैं। एकतरह से बकरियां उसकी दोस्त हैं। स्कूल से आते ही कडुए तेल से चुपड़ी और बुकनू लगी रोटी ले वह उन्हें चराने चल देता है। मुहल्ले के लोग उसे नन्हा बरेदी कहते हैं। ग्रामीण इलाकों में बकरियां पालने वाले को बरेदी कहा जाता है। बकरियां अभी भी सहज नहीं हुई हैं। अबरार सुबक रहा है। उसने सभी बकरियों के नाम रखे हैं। जो सफेद-काली है उसे चितकबरी, जो लाल-काली है उसे लालमनी और छोटी वाली बकरी को वह छुनिया बुलाता है। इसी तरह बाकी बकरियों के भी नाम रखे हैं। छुनिया बाकी बकरियों की तरह नहीं चिल्ला रही बस बीच-बीच म्हे कर देती है। पर इस म्हे में दर्द बहुत है। छुनिया गर्भ से है, कुछ ही महीनों में वह भी मां का सुख भोगेगी। अबरार की सुबकन मुझसे नहीं देखी जा रही। बाकी लोग भी द्रवित हैं।

सुनातर या बरजतिया देख लिया होगा तभी चिल्ला रही हैं, अभी चुप हो जाएंगी, सोओ जाके सब लोग बतंघड़ न बनाओ, मंझली चच्ची गुस्से में सबसे बोलीं और दांत में दुपट्टा दबाके सोने चली गईं। सुनातर और बरजतिया सापों को कहा जाता है। सुनातर को सुनाई नहीं देता और बरजतिया काफी बड़ा होता है, तेज भागता है। गांवों में अक्सर ये सांप देखे जाते हैं, लेकिन वे बिरले ही लोगों को काटते हैं। वे चूहों के शिकार के लिए घरों में आ जाते हैं। ज्यादातर भूसा वाली कुठरिया में लकड़ी या कंडों के बीच छिप जाते हैं।

इस बीच राजू चाचा बोले चिटकान्हा हुई सकत है। धत्त झटिहा सार, भाग हेन ते बड़ा आओ बतावन चिटकान्हा हुई सकत है। अब्बा के अईसे गरियाने से राजू चाचा सकपका गए और धीरे से वहां से खिसक लिए। अब्बा मुहल्ले भर के अब्बा हैं, वे सब पे अपना हक जताते हैं। इसलिए उन्हें ज्यादातर लोग अब्बा ही कहते हैं। अब्बा का पारा गरम देख सब बगलें झांकने लगे और जाने को हुए कि तभी हवा का तेज झोंका आया और किवाड़े के बगल में ताक पर जल रहे चराग को बुझा गया। अब बरोठे में घुप्प अंधेरा हो गया। बकरियां जो थोड़ा सा चुप हुईं थीं अब फिर से चिल्लाने लगीं। अब्बा पहले से ही गुस्साए थे अंधियारा होने पर और तेजी से चिल्लाए, चराग कौन जलाएगा।

रहमान आंगन की तरफ भागा और चारपाई में बिछे बिस्तर में माचिस टटोलने लगा। चूल्हे के पास देख जा के वहीं रखी है माचिस, अम्मा ने जोर से कहा। रहमान ने चूल्हे के पास, पखिया और खाना रखने वाली दीवार में बनी टीपारी में माचिस ढूंढी पर न मिली। 
बाहर जा मेरे बिस्तर में सिरहाने रखे कुर्ते में माचिस है ले के आ, अब्बा ने गरजते हुए कहा। रहमान ने कुर्ते से माचिस निकाल ली। उसने साथ में बालक बंडल से चार ठो बीड़ी भी निकालकर जेब में छिपा लीं। रहमान 15 बरस का है। गांव के अधिकांश किशोरवय लड़के बीड़ी और स्वागत तम्बाकू खाने लगे हैं। कुछ वक्त पहले गांव के भोला और महेश अपने पापा की बीड़ी चुराकर फूंकते पकड़े गए थे तो बहुत मार पड़ी थी। तब से सब नशा-पत्ती से दूर थे। लेकिन अब के छिटांक-छिटांक भर के लड़के चौधरी और पॉवर गुटखा भी खाते हैं, लेकिन छिप-छिपाकर। दांत लाल हो गए हैं, उन्हें साफ करने के लिए एक-एक घंटे तक नीम की दातून घिसते हैं। ज्यादातर नदिया किनारे बीड़ी पीने जाते हैं। कई सुबह शौच से पहले बीड़ी पीते हैं। बीड़ी नहीं मिलती तो उनका पेट साफ नहीं होता है। गांव के ज्यादातर मर्द नदी किनारे खुले में शौच करने जाते हैं। युवाओं की संख्या इनमें ज्यादा है। किसी-किसी के घर में ही शौचालय है।

अब्बा ने झिड़कते हुए रहमान के हाथ से माचिस छीनी और चराग जलाया। अभी एक मिनट भी न हुआ था कि चराग मद्धम होते हुए बुझने लगा। उन्होंने चराग हिलाया तो उसमें तेल खत्म हो गया था। अब वे फिर चिल्लाये, कोई काम ढंग से नहीं हो पाता है। न जाने का करेंगे सब। अब्बा और चिल्लाते इससे पहले ही अम्मा बोल पड़ीं- मिट्टी का तेल खत्म हो गया है। अबकी महीने में कोटेदार ने दुई लीटर तेल ही दिया था। एक चराग आप छपरा तरे रखते हो, दूसरा चूल्हे के पास रहता है जो बाद में रहमान और अबरार पढ़ने के लिए उठा ले जाते हैं और तीसरा बरोठे में बकरियों के पास जलता है, तीन ही चराग तो हैं घर में। इतना कहते-कहते अम्मा झुंझला गईं और आंगन में बिछी चारपाई पर जाके धम्म से बैठ गईं। ये सुनकर अब्बा का चेहरा और तमतमा गया। बोले-पब्लिक के लिए साला आता 5 लीटर तेल है पर मिलता तीन लीटर ही है, उसमें भी किसी-किसी महीने तो कोटेदार तेल गोल कर जाता है। अबकी तो दुई लीटर ही दिया हरामखोर ने। राशन के भी यही हाल हैं। मनमर्जी चल रही है सबकी। सब खुदै का अधिकारी और नेता समझत हैं। अईसे ही रहा तो अबकी साली सरकार बदलीही जाएगी।
अब्बा चराग जलाओ, रहमान ने कहा। अब्बा ने रहमान के लाये चराग को जलाया।

बकरियां अब पहले से थोड़ा शांत थीं पर पूरी तरह नहीं। एक चुप होती तो दूसरी चिल्लाने लगती। मैं आंगन में पड़ी चारपाई में जा के पसर गया। सुबह के चार बजे गए थे। आसमान का कालापन कम हो रहा था। तारे अब कम गाढ़े दिख रहे थे। शंकर जी के मंदिर की घंटियां भी बजनी शुरू हो गईं थीं। आरती का समय हो गया था। मैं कब सो गया पता ही नहीं चला।
सुबह आंख खुली तो मैं उठा और बरोठे में गया जहां बकरियां बंधीं थीं, वहां एक भी बकरी नहीं थी। कोने में ढेर सारी राख फैली थी। मैं आंगन में फिर लौटा और चच्ची के कमरे की तरफ आवाज लगाई, पर कोई नहीं बोला। पास गया तो देखा दरवाजे पर कुंडी लगी हुई थी। पूरे घर में सन्नाटा पसरा था। मैं चारपाई में फिर बैठ गया। तभी बाहर से जोर-जोर से आवाजें आने लगीं तो बाहर की भागा और सीधे बाहर चउरा पर पहुंच गया। वहां लोगों की भीड़ लगी थी। रहमान, अब्बा, अम्मा, राजू चाचा और गांव भर के लोग जूट थे। एक किनारे अबरार बैठे रो रहा था उसके पास ही खून बिखरा पड़ा था। पास पहुंचा तो मैं अवाक रह गया। मुझे देख अबरार मुझसे चिपट गया और जोर-जोर से रोने लगा। पास में ही उसकी सबसे प्यारी बकरी छुनिया मरी पड़ी थी। उसके मुंह से झाग निकला हुआ था। बगल में उसका भ्रूण भी पड़ा था। राजू चाचा ने बताया किसी ने अब्बा से दुश्मनी निकालने के लिए रात में छुनिया के पेट में लात-घूंसे चलाये और कोई देख पाए इससे पहले ही भाग निकला। बाहर रास्ते की तरफ सो रहे चम्पू ने रात में अब्बा के बरोठे से निकल भागकर जाते एक आदमी को देखा था पर अंधेरा होने की वजह से वह पहचान नहीं पाया। चम्पू ने भी मुझसे इस बात की तस्दीक की। डॉक्टर साहब बता गए थे कि छुनिया को घास में मिलाकर जहर भी खिलाया गया।

घर वाले, मुहल्ले वाले सब गुस्से में हैं। हमारी तो किसी से दुश्मनी भी नहीं, कोई बेजुबानों से कैसे रंजिश निकाल सकता है, अम्मा रो रोकर कह रही हैं। अब्बा उन्हें ढांढस बंधा रहे हैं। बाकी बकरियां सदमे में हैं। किसी ने घास तक नहीं खाई है, वे पागुर तक नहीं कर रहीं हैं। घनघोर शोक में हैं वो। अबरार अभी भी मुझसे लिपटा हुआ है, उसके आंसुओं से मेरे पेट के पास की शर्ट गीली हो चुकी है। बाकी बची बकरियों और अबरार का दर्द एक है। उसे कोई नहीं समझ पाएगा। ये पीड़ा असहनीय है।

Sunday, 28 October 2018

रेख्ताओं में मीर तकी मीर और उनकी मुहब्बत

मेरे परम मित्र हैं नीलेश और सूरज। सूरज की एक सोशल मीडिया पोस्ट पर नीलेश ने टिप्पणी लिखी जो मुझे महान शायर मीर तकी मीर से मिला लाई। टिप्पणी कुछ इस प्रकार थी कि....
"ग़लत है ये, तुम तो भड़के आशिक़ हो और शायरी लिखना तुम्हारा पेशा है।"
ये लफ्ज़ सीधा मीर तकी मीर से ताल्लुक रखते हैं। ऐसा मेरा मानना है। तो फिर आइये मैं आपको अपने मीर से मिलाता हूं।

ये मीर के जवानी के दिन थे। दिल्ली सल्तनत में बादशाह समसामुद्दौला के यहां महान शायर मीर तकी मीर ने उर्दू शायरी को एक मुकाम पर पहुचा दिया। ये बात करीबन 1735 के आसपास की है। बादशाह ने मीर को एक रुपये के वजीफे पर अपने यहां रख लिया। मीर अपनी शायरी और रेख्ताओं में उर्दू ज़बान के साथ हिंदुस्तानी लफ़्ज़ों का खूब इस्तेमाल करते थे। यही वजह रही कि दरबार मीर की शेर-ओ-शायरी में डूब गया। कुछ वक्त के लिए वे अपने घर यानी आगरा लौट आये।


इस बीच करीब 1739 में फारस के बादशाह नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण कर दिया। कई दिनों तक चले युद्ध में बादशाह समसामुद्दौला मारे गए। तख्त छिन गया और नादिरशाह ने सल्तनत पर कब्ज़ा कर लिया। इस घटना ने मीर को झकझोर दिया। उनका वजीफा भी बंद कर दिया गया। वह दिल्ली में ही अपने सौतेले भाई के मामू सिराजुद्दीन अली खान आरजू के यहां रहने लगे। सिराजुद्दीन भी ग़ज़ब शायर थे।

इस दरमियान मीर को बला की खूबसूरत महताब बेगम से मोहब्बत हो गई। महताब भी मीर के शायराना अंदाज़ में पाबस्ता हो गईं। अब मीर की शायरी और रेख्ताओं में इश्क की चाशनी घुल गई। वे अक्सर जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठे शायरी कहा और लिखा करते। बात भी शायराना अंदाज़ में ही करते। मीर सारे जमाने में मशहूर हो गए। गोशे गोशे में उनके रेख्ता बैठ गए, उनके मुहब्बत में डूबे कलाम बुलंदियां चूमने लगे। महताब और मीर की मुहब्बत चिड़िया की मानिंद हवा में उड़ान भरने लगी। इश्क को नज़र लगते देर नहीं लगती। बाजार में इश्क के चर्चे होने लगे। मीर से जलने वाले दूसरे शायरों ने दरबार में मनमाफिक बातें पेश कीं। बादशाह तक बात पहुंची तो कहर हो गया। कहते हैं बादशाह भी महताब के हुस्न पर लट्टू थे।

अगले रोज़ दरबार सज गया और मीर समेत बड़े शायर हाज़िर हुए। शेर-ओ-शायरी का दौर शुरू हुआ। मीर की मुहब्बत से खफा बादशाह ने हुक्म जारी कर महताब को दरबार में बुलवाया और मीर के ही शेरों और रेख्ताओं पर महताब से मुजरा करवाया। मुहब्बत की तौहीन मीर को बर्दास्त न हुई और वे दरबार से जाने लगे, बादशाह ने मीर को अपने पास बैठने और पूरा मुजरा देखने का हुक्म दिया। आशिक को हुक्म बर्दास्त न हुआ और मीर दरबार छोड़कर चले गए। बादशाह के हुक्म की नाफरमानी इससे पहले किसी ने न की थी। सल्तनत में हल्ला हो गया।

आशिकों पर किसका ज़ोर चला है जो बादशाह का चलता। बादशाह ने मीर को अकेले में समझाने-बुझाने की तरकीब से बुलावा भेजा। अगले रोज़ बादशाह के आरामखाने में मीर पहुंच गए। बातचीत शुरू हुई और माहौल गरमा गया।

बादशाह ने कहा- "महताब से तुम्हारी मुहब्बत ग़लत है ये, तुम तो आज भड़के आशिक़ हो। सिर्फ शायरी लिखना तुम्हारा पेशा है।"

इस पर मीर के जवाब सुन बादशाह आगबबूला हो गए। मीर अपने आशियाने लौट आये। रात में जब आसमान में चांद खिल रहा था तब मुहब्बत के आंगन का महताब बुझ गया। मीर दर्द में डूब गए, उन्हें चांद में महताब दिखने लगा।

Friday, 14 September 2018

मौत के मकां

मौत के मकां, खूब हैं यहां
देख लो देख लो खूब गौर से
आ रहे लोग यहां दूर दूर से
न है किसी को पता न किसी को खबर
कितनी रेत डाली है कितनी छोड़ी डगर
बिल्डर ने सारे नियम तोड़ डाले हैं
सीमेंट सरिया हल्की डाली, कच्चे ईंट डाले हैंमौत के मकां, poem
हम गए हम गए तुम भी पहुंच गए
बातों में आके बिल्डर को नोट दे दिए
सोच न सके कुछ भी सोच न सके
हमने एक लिया प्लॉट तुमने दो लिये

प्लॉट के नाम पे फ्लैट दे दिया 
बुरे फंसे बुरे फंसे हमको ठग लिया
मन मसोसकर फिर रहने चले गए
मकां सजा दिए पूजा भी कर दिए
रह रहे थे हम तो खूब शान से
अपने अपने घर में जो आलीशान थे
फिर नज़र लगी किसी कि दिन काला हो गया
जोर का शोर हुआ और गुबार छा गया
चारों ओर चारों ओर हर कोई रो पड़ा
आलीशां आलीशां मकां मेरा ढह गया

मौत आई मौत आई रूह कांप गई
गृहस्थी उजड़ गई ज़िन्दगी बिखर गई
भीड़ आई लोग आए जमघट भी लग गया
देखते देखते सपना वो थम गया
कुछ मरे कुछ दबे कुछ मिले भी नहीं
देखिए आज तो रोशनी भी काली हो गई
सब बिलख बिलख गये मुलाज़िम आ गया
पांच पांच लाख का ऐलान कर गया
मौत सस्ती देख के दिल ये रो गया
हाय हाय हाय क्या से क्या हो गया
जान गई माल गया वज़ूद भी चला गया
वो देखो वो देखो बिल्डर तो हंस रहा।


- रिज़वान नूर खान

Thursday, 13 September 2018

मुर्गे की दावत


गांव के बदलते स्वरूप को आलेख रूपी छोटी-छोटी यादों को समेटे रामधारी सिंह दिवाकर की 'जहां आपनो गांव' किताब हाल ही में साहित्य संसद प्रकाशन दिल्ली से छपकर आई है। किताब में बिहार के अररिया ज़िलें के गांवों का ज़िक्र किया गया है। वहां के हालातों, मजदूरों की मुश्किलों और उनके आधुनिक होने के साथ ही गांव-देहात की अच्छी-बुरी बातों का वर्णन है।

लेखक ने किताब की दूसरी कहानी में हनीफ चाचा को केंद्र में रखा है। हनीफ बुजुर्ग हैं, उनका कोई पक्का रोजगार नहीं है। एक तरह से मजदूर ही हैं। करीब तीन बीवियां और 18 बच्चों का कुनबा है। इसके अलावा कई मुर्गियां और बकरियां हैं। परिवार की जीविका मुश्किल से चलती है। मुर्गे-बकरियों की वजह से आये-दिन पड़ोसियों से कहासुनी होती है। कई बार मारपीट और ख़ूनमखून भी हो चुका है। जबकि कई लोगों से उनकी अच्छी पटती भी है।

हनीफ चाचा का मुर्गा सुबह से नहीं मिल रहा, अब शाम हो गई है। हनीफ और बाकी लोग जानते हैं कि मुर्गा पड़ोसी बनिये ने खुंदक निकलने के लिए पकड़कर छुपा लिया है। हितैषियों के कहने पर हनीफ चाचा थाने में शिकायत करने पहुंचे हैं। दरोगा ने चाचा को सुना, तम्बाकू थूकी और लार टपकाती आंखों से इशारा कर रुपये मांगे। चाचा बनिये को पिटवाना और मुर्गे को वापस पाना चाहते हैं तो कुर्ते की जेब से 20 का नोट निकालकर दे दिया।

बनिये को थाने में दांत-डपट के बाद चार-छै डंडे पड़े तो मुर्गा लाकर दरोगा को सौंप दिया। हनीफ चाचा को अब तसल्ली है। बनिये की बेइज्जती हो गई। थाने से छोड़ने के नाम पर दरोगा और दलालों को जेबें भी गरम हो गईं। तमाशा देखने वालों का मनोरंजन हो गया। हनीफ चाचा मुर्गा लेकर जाने लगे तो दरोगा ने घुड़क दिया और उसे काट-छीलकर लाने को कहा। शाम को थाने में मुर्गे की दावत उड़ी।

इस लड़ाई में न हनीफ चाचा को कुछ हासिल हुआ और न बनिये को कुछ मिला। बल्कि दूसरे-तीसरे लोग मलाई काट गए। करीब दो दशक पुरानी इस घटना ने आज और विस्तार पा लिया है। घूसखोरी और एक-दूसरे से जलने-कुढ़ने की आदत का कैनवास पहले कहीं ज्यादा बड़ा हो गया है।

लेखक रामधारी सिंह दिवाकर कई किताबें, कहानियां लिख चुके हैं। अररिया ज़िले के नरपतगंज गांव के रहने वाले हैं। मिथिला विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष पद से रिटायर हैं। उनकी यह किताब अभी पूरी पढ़ी नहीं है। पढ़ रहा हूं पर अभी तक जितनी पढ़ी है उससे कह सकता हूं कि किताब 'जहां आपनो गांव' में संकलित संस्मरण अच्छे हैं। इसे पढ़ा जाना चाहिए।

Sunday, 10 June 2018

बुंदेलखंड का सूखा

बुंदेलखंड हमेशा से कम बारिश वाला इलाका रहा है, लेकिन 2002 से लगातार सूखे ने मर्ज़ को तकरीबन लाइलाज बना दिया है.यह जमीनी बताती है कि बुंदेलखंड को ईमानदार कोशिशों की ज़रूरत है. साफ-सुथरी सरकारी मशीनरी अगर आम लोगों को साथ लेकर कोशिश करे तो सूखता जा रहा बुंदेलखंड शायद फिर जी उठे।


दिल्ली के पास वैशाली में तकरीबन नियमित रूप से एक रिक्शेवालेचेतराम से मेरी मुलाकात होती है जो अमूमन सफ़ेद कमीज़ और पाजामे में होता है। वही चेतराम मुझे एक रोज़ अपने घर के असबाब के साथ सड़क पर खड़ा मिल गया। उसकी झुग्गी उजाड़ दी गई थी। आनंद विहार, दिल्ली की सरहद है और एक सड़क इस केंद्रशासित प्रदेश को उत्तर प्रदेश से अलग करती है। इसी सड़क से थोड़ा और आगे जाएंगे तो वैशाली और इंदिरापुरम जैसी पॉशकॉलोनियां हैं।

वैशाली में, जहां मैं रहता हूं, आसपास अभी अनगिनत खाली प्लॉट हैं, जिनपर न जाने कितने लोग झुग्गियां बनाकर रहते हैं। वहां महागुनमेट्रो और शॉप्रिक्स जैसे चमचमाते मॉल्स हैं, जहां की दुनिया में पॉपकॉर्न जैसी चीज़ें मक्खन के साथ खाई जाती हैं, उससे थोड़ा आगे ही करोड़ों की कीमत वाले खाली प्लॉट्स पर झुग्गियों में न जाने कितनी ज़िंदगियां अपने अरबों-खरबों के सपनों को जीने लिए जाने कहां-कहां से आती हैं।

चेतराम भी उन्हीं में से एक हैं, जो उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड से पलायन करने को मजबूर हुए हैं। बिरादरी से दलित चेतराम पेट पालने के चक्कर में घर छोड़कर यहां किसी और की ज़मीन पर रहते हैं, जहां उनकी झुग्गी अवैध और गंदी बस्ती के रूप में गिनी जाती है।

ऐसी ही किसी गिनती को कम करने के लिए गाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण ने सभी खाली प्लॉटवालों को अपने प्लॉट पर निर्माण कार्य शुरू कराने का आदेश दिया, ऐसा न करने पर आवंटन रद्द कर दिया जाता। इसीलिए, चेतराम की झुग्गी उजाड़ दी गई। झुग्गी ही नहीं उजड़ी, उनका घर और उनकी दुनिया भी उजड़ गई। अब चेतराम और उसके गांव के उसके ही जैसे लोग, मकनपुर गांव में रहते हैं। वहां भी वो किसी खाली ज़मीन पर ही रहते हैं, जहां रोज़मर्रा की दिक्कतें हैं। पानी की, शौच की, सफ़ाई की, हर क़िस्म की दिक़्क़त।

चेतराम, बुंदेलखंड के अपने गांव गन्हौली से निकले तो अपने पीछे सात बीघा ज़मीन छोड़कर आए थे। वे बड़े शान से बताते हैं कि उनका इलाका बेमिसाल राजाओं का इलाक़ा रहा है। राजा परमार देव का ज़िक्र करते हुए चेतराम कहते हैं-बड़े लड़इयामहुबे वाले, इनकी मार सही न जाए। ठीक है कि इतिहास में महोबे के वीरों की मार बहुत भारी थी और उन्हें हराना कठिन था लेकिन आज की तारीख़ में पानी ने सबको त्रस्त करके रख दिया है।

चेतराम के इलाक़े में एक के बाद कई एक बरसों तक नियमति बारिश नहीं होने से खेती फ़ायदे का सौदा नहीं रह गया। सात बीघा ज़मीन को बटाई पर लगाकर, काम की तलाश में चेतराम सपरिवार दिल्ली आ गए। बटाई वाली ज़मीन से कुछ मिलता नहीं। दिल्ली में वे ख़ून-पसीना बहाते हुए रिक्शा चलाते हैं। लेकिन उनकी आंखों में गांव वापस जाने का सपना और उम्मीद भी ज़िंदा है।

केन नदी के किनारे ज़िंदगी उम्मीद के सहारे आगे बढ़ती है। शायद इसी ने ज़िंदा रखा था, गढ़ा गांव के प्रह्लाद सिंह को। बड़ी-बड़ी शानदार मूंछों वाले प्रह्लाद सिंह ने अपनी जवानी में किसी का क़त्ल कर दिया था। क़त्ल का जुर्म अदालत में साबित हो गया, 1962 में बांदा ज़िला अदालत ने उन्हें सज़ा-ए-मौत सुनाई। लेकिन, प्रह्लाद सिंह को राष्ट्रपति से जीवनदान मिला और उनकी सज़ा आजीवन कारावास में बदल दी गई।

प्रह्लाद सिंह ने दस साल जेल में काटे थे कि सन बहत्तर में नेकचलनी की वजह से उन्हें वक़्त से पहले रिहा कर दिया गया। प्रह्लाद, गांव लौटे तो नई उम्मीद के साथ ज़िंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश की। गृहस्थी की गाड़ी चल निकली। 

अभी एक दशक पहले तक सब कुछ ठीक-ठाक था। लेकिन परिवार बड़ा हुआ तो प्रह्लाद सिंह और उनके भाई ने मिलकर ट्रैक्टर के लिए बैंक से कर्ज़ ले लिया। इसी कर्ज़ ने उनके परिवार को बरबाद कर दिया। साल 2002 के बाद बुंदेलखंड का पूरा इलाक़ा लगातार सूखे की गिरफ़्त में आता गया। यह इलाक़ा पहले से ही कम बारिश वाला रहा है, लेकिन लगातार सूखे ने मर्ज़ को तकरीबन लाइलाज बना दिया। प्रह्लाद सिंह की खेती चौपट हो गई। आमदनी का ज़रिया जाता रहा। बैंकों को कर्ज़ दिए गए पैसे वापस चाहिए थे। 

यह बात और है कि यह बैंक सरकारी थे और इस देश में विजय माल्या जैसे कई उद्योगपति हैं जिन्होंने इन्हीं सरकारी बैंकों का पैसा दबा रखा है, और चुकाने के वक्त विदेश चले गए। यह बात भी और है कि देश के 6 हज़ार उद्योगपतियों ने बैंकों से सवा लाख करोड़ का कर्ज़ ले रखा है। उनमें से कोई आत्महत्या नहीं करता, न ही उन पैसों के लिए बैंक कभी हलकान होता है और उनके घर भाड़े के गुंडे भेजता है।

लेकिन गढ़ा गांव के किसान प्रह्लाद सिंह के घर बैंक ने भाड़े के गुंडे भेज दिए। वह साल 2007 था, जब किराए के गुंडों ने बैंक की तरफ़ से प्रह्लाद सिंह के ट्रैक्टर को कब्ज़े में ले लिया। ट्रैक्टर नीलाम कर दिया गया और उसके बाद बची बाक़ी की रकम की देनदारी की आख़िरी नोटिस भी निकाल दी गई।

जिन लोगों ने भारत के किसानों को ज़रा नज़दीक से देखा होगा, उन्हें इस बात का अंदाज़ा होगा कि एक किसान के लिए कितनी अहम होती है, उसकी साख, उसकी इज़्ज़त। खेत सूखे थे, कमाई का एक ज़रिया ट्रैक्टर था, वह भी चला गया। पहले तो प्रह्लाद सिंह के परेशान भाई और फिर उनके बेटे, बच्ची सिंह ने आत्महत्या कर ली। सयानी हो रही पोती मनोरमा चाहती थी कि वह अपने दादा को ब्याह के खर्च से बचाए। मनोरमा भी एक दिन डाई (बालों में लगाने वाला रंग) पीकर हमेशा के लिए सो गई। दिवंगत बेटे और पोती की तस्वीर दिखाते प्रह्लाद सिंह कहते हैं कि उन्होंने राष्ट्रपति से ऐसे बुढ़ापे के लिए क्षमादान नहीं मांगा था।

बुंदेलखंड का एक ख़ुद्दार किसान, कर्ज़ चुकाना तो चाहता है लेकिन प्रह्लाद सिंह जैसे किसानों की मजबूरी है कि जिस खेती पर उन्होंने अपनी ज़िंदगी गुज़ार दी, वह खेती आज उनके बीज तक वापस नहीं कर पा रही।  प्रह्लाद सिंह की यह कहानी पूरे बुंदेलखंड की सवा दो करोड़ की आबादी की कहानी से कमोबेश मिलती-जुलती है। प्रह्लाद सिंह की ही तरह बाक़ी लोगों की उम्मीदों की डोर टूटने लगी है। कर्ज़ एक तरह से गांव के लोगों के लिए जीने की शर्त बन गए हैं। लेकिन, ये शर्त जानलेवा है।
साभार- मंजीत ठाकुर की किताब 'बुंदेलखंड: बूंद चली पाताल' से।

Sunday, 24 May 2015

तेरे गुम होने का दर्द


तेरे गुम होने का दर्द


क्या आपका अभी तक कुछ गुम हुआ है? फॉर एग्जांपल, दिल, पैसे, मोबाइल, मार्कशीट या रूम, अलमारी, ऑफिस, ड्रॉर की चाबी। और इनमें से किसके गुम होने का सबसे ज्यादा अफसोस हुआ या होता है?
यही सवाल मैनें अपने एक मित्र महोदय से किया। आंसर के तौर पर वे तपाक से बोले दिल गुम हुआ है, जो आज तक नहीं मि
ला। मैंने टेढ़ी निगाह से महोदय को घूरा और बोला अमां मियां जब दिल गुम हो चुका है तो तुम्हारे शरीर में जान क्यों बाकी है? खून पंप होना बंद क्यों नहीं हुआ? तुम मरे क्यों नहीं? अब मित्र महोदय की बोलती बंद, सें‌टियाने लगे।

मैं जान गया, दिल कहीं गुम नहीं होता, हम जबरदस्ती खुद को उसके गुम होने का अहसास कराते हैं, लेकिन आखिर तक वह अहसास हमें होता नहीं। क्योंकि वो सच नहीं होता।

मेरे एक और मित्र महोदय हैं, मैनें भी उनसे यही सवाल दागा। वे काफी रोनी सूरत में बोले भाईजान काफी दिन पहले मेरे पचास हजार रुपए गुम हुए हैं, जो आज तक नहीं मिले। महोदय के हाथ में एक लाल कलर की चमकीली बैग थी। मैंने पूछा इसमें क्या है? तो काफी ना-नुकु र के बाद बताया कि उसमें कुछ-एक लाख रुपए हैं। मैनें कहा, तो फिर गुम कहां हुए वो तो आपके पास ही हैं। बस दुगुने होने के लिए आपसे विदा हुए थ्ो।
कुछ देर मन मशक्कत करता रहा कि इतने में हमारे गंवइले चचा भिटा गए। अब मैनंे उनसे भी यही सवाल ठोंक दिया। वे तो जैसे ताव में आ गए, सांप की भांति फुंफकारते हुए बोले, अरे ससुरा हमरा मोबाइल गुम हुआ है। उसमें ससुर उस लौंडे का नंबर सेव किये रहे हम, जो हमरी बिटेना का मिस काल करके परेशान करत रहा। मैंने मन ही मन सोचा कि इनकी बिटेना तो कल ही गांव की बाजार वाली गली में पड़ोसी लौंडे से बतिया रही थी। खबर है दोनों का चक्कर भी चलता है।
मुझे सही जवाब मिलने की जगह, लोगों के गम की अलग-अलग वजहें मिलीं।
दरअसल कौन सी वस्तु के गुम होने से आपको दुख-अफसोस होगा। यह पूरी तरह आपकी कंडीशंस पर और उस वस्तु की इंपार्टेंस पर डिपेंड करता है।
कुछ ऐसे समझिए 'जरूरी कुछ भी नहीं और जरूरी सबकुछ है।’
कल शाम की ही बात है। आफिस से वापस आते समय रास्ते में कहीं मेरा चाबी का गुच्छा जेब को बिना इत्तिला किए या यूं मान लें कि उससे सांठ-गांठ साध कहीं सरक लिया। गुच्छा खुद तो गया ही अपने साथ आफिस ड्रॉर, रूम और अलमारी की चाबियों को भी बरगला ले गया।
अब मुझे अफसोस के साथ ग्लानि, तकलीफ और बेचैनी हो रही है। यह बेचैनी कब तक रहेगी? शायद आज रात तक, सुबह तक या पूरे दिन तक। लेकिन एक समय खत्म हो ही जाएगी। क्योंकि समय ही सब विपत्तियों और सुखों का जिम्मेदार होता है, और यह ‌िककिसी के लिए भ्‍ाी नहीं रुकता।

Friday, 1 August 2014

कई हजार ईसा पूर्व पैदा हुये अजूबे

विश्व के प्राचीन अजूबे


दुनिया बहुत सुन्दर है। प्रकृति ने अपने रंग से इस दुनियां को बहुत ही रंगीन बनाया है। समुद्र, पहाड़ और जमीन के मिलन से प्रकृति ने कुछ ऐसा नजारा हमारे लिए तैयार किया है जिसकी कल्पना करना इंसान के लिए कभी-कभी सपने जैसा हो जाता है। दुनिया में प्रकृति ने इतना रंग घोला है कि इंसान में भी इसे और सुन्दर बनाने की ललक पैदा हो गई। कभी अपनी याद के लिए तो कभी कला को समर्पण करने के लिए तो कभी किसी अन्य वजह से इंसान ने ऐसी कई रचनाएं की हैं जिनसे यह दुनिया और भी खूबसूरत बन गई है।
संसार में यूं तो इंसान द्बारा बनाई गई हजारों ऐसी कृतियां हैं जिन्हें देख आप अंचभे में पड़ जाएंगे लेकिन दुनिया के सात अजूबों की बात ही अलग है। अपनी शिल्प कला, वास्तु कला और भवन निर्माण कला के लिए दुनिया के सात अजूबे हमेशा चर्चा का विषय बने रहते हैं। आज बात कुछ प्राचीन एवं कई हजार ईसा पूर्व बूढ़े हो चुके अजूबों के बारे में।

 

मिस्र के पिरामिड 

मिस्र के पिरामिड दुनिया के प्राचीन सात अजूबों में एकमात्र सुरक्षित मिस्र के पिरामिडों का निर्माण आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व हुआ था। वास्तव में, ये पिरामिड मिस्र के शासकों के मकबरे हैं। सबसे बड़ा पिरामिड काहिरा से कुछ दूर गीजा कस्बे में स्थित है। यह राजा पैरोखूफू और उसकी रानी का मकबरा है। 481 फुट ऊंचे इस मकबरे के वर्गाकार आधार की प्रत्येक दीवार की लंबाई 75० फुट के लगभग है। इसमें बीस लाख से अधिक शिलाखंड हैं। माना जाता है कि दो हजार से भी अधिक मजदूरों ने बीस वर्षो तक कार्य करके इसे तैयार किया था।

मासोलस का मकबरा

संसार का तीसरा अजूबा हेलीकारनासस के शासक मासोलस का मकबरा था, जिसका निर्माण उसकी पत्नी ने करवाया था. यह लगभग सौ फुट ऊंचा था और उसके ऊपर घोड़े जुते रथ पर राजा-रानी की मूर्तियां थीं। निर्माण के कुछ ही दिनों बाद सकिदर महान के आक्रमण के कारण यह मकबरा ध्वस्त हो गया। राजा-रानी की मूर्तियां आज भी ब्रिटिश संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

देवी डायना का मंदिर

विश्व का चौथा अजूबा एफसेस में देवी डायना का मंदिर था। आठ फुट ऊंचे खम्भों पर टिके छत वाले इस मंदिर का निर्माण ईसा से साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व टर्की में हुआ था। इस समय यह मंदिर बहुत पवित्र माना जाता था। लोग इसमें अपना धन एवं कीमती वस्तुएं रखकर निश्चिंत हो जाते थे। 262 ई. में गोथ्स ने इस मंदिर को जला डाला था।

हीजियोस की कांस्य प्रतिमा

दुनिया का पांचवां अजूबा हीजियोस की कांस्य प्रतिमा थी। जो लगभग सौ फुट ऊंची थी। यह रोड्स द्बीप में थी। इसका निर्माण ईसा से 28० वर्ष पूर्व हुआ था। निर्माण के 56 वर्ष बाद यह प्रतिमा भूकंप में नष्ट हो गयी। जीयस देवता की मूर्ति संसार का छठा अजूबा ओलम्पिया में स्थित जीयस देवता की मूर्ति थी। इसे प्रसिद्ध शिल्पकार फीडिसस ने ईसा से साढ़े चार सौर वर्ष पूर्व बनाया था। चालीस फुट ऊंची इस मूर्ति के कपड़े सोने के थे। शरीर हाथी दांत का बना था। मूर्ति की आंखें कीमती हीरों से बनी थीं। इस मंदिर को ईसाइयों ने नष्ट कर दिया था।

फैरोह का प्रकाश स्तंभ 

दुनिया का सातवां अजूबा सकिदरिया के बंदरगाह के पास एक द्बीप पर बना फैरों का प्रकाश स्तम्भ था। सफेद संगमरमर से बना यह प्रकाश स्तंभ छह सौ फुट ऊंचा था। इसका निर्माण ईसा से 283 वर्ष पूर्व हुआ था। यह प्रकाश स्तंभ डेढ़ हजार वर्षों तक ठीक हालत में रहा, उसके बाद भूकंप में नष्ट हो गया।





 

Sunday, 13 April 2014

दुनिया का सबसे बड़ा होटल

दस हजार कमरों वाला दुनिया का सबसे बड़ा होटल

यूं तो पूरे विश्व में कई अजब-गजब इमारतें हैं, लेकिन जर्मनी में बाल्टिक सागर के आइलैंड में स्थित होटल प्रोरा अपने आप में एक अजूबा है। इस होटल में तकरीबन दस हजार कमरे हैं। इतने कमरों वाला होटल पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। आपको आश्चर्य होगा कि दुनिया का सबसे विशाल होटल पिछले 7० सालों से वीरान पड़ा है।
जर्मनी के नाजी शासन ने इस विशाल होटल दा प्रोरा का निर्माण 1936 से 1939 के बीच में करवाया था। इसे बनाने में 9,००० लेबरफोर्स को तीन साल लगे थे।
 
होटल प्रोरा में एक समान 8 बिल्डिंग बनाई गई हैं और हर बिल्डिंग की लंबाई 4.5 किलोमीटर है। यह बिल्डिंग समुद्र से बमुश्किल 15० मीटर दूर है। इसमें चार एक जैसे रिसॉर्ट थे, सभी में सिनेमा, फेस्टिवल हॉल और स्वीमिग पूल भी थे।
जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर का यह प्लान बहुत महत्वाकांक्षी था। वह एक घुमावदार सी रिसॉर्ट बनाना चाहता था, जो विश्व में सबसे विशाल हो। इस होटल के हर कमरे में दो बेड, एक अलमारी और एक सिक बनाया गया है। हर फ्लोर में टॉयलेट्स, शॉवर और सामूहिक बॉथरूम बनाए गए थे। बिल्डिंग के मध्य में यह व्यवस्था की गई थी कि युद्धकाल में इसे अस्पताल में बदला जा सके।
 
हिटलर का यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पूरा होता, इससे पहले ही द्बितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया। विश्वयुद्ध खत्म होने के बाद पूर्वी जर्मनी के विस्थापितों को इस होटल में रखा गया था। इसके बाद जर्मनी ने इसका उपयोग एक मिलिट्री पोस्ट के लिए किया।
आज भी यह बिल्डिंग काफी खूबसूरत लेकिन वीरान है। हालांकि इसके कुछ ब्लॉकों को छोड़कर बाकी खंडहर हो गए हैं। 


2०11 में इसके एक ब्लॉक में 4०० बिस्तरों वाला अस्पताल बनाया गया। अभी होटल प्रोरा को 3०० बिस्तरों वाले एक हॉलीडे रिसॉर्ट में बदलने की तैयारी चल रही है। इसमें नए सिरे से टेनिस कोर्ट, स्वीमिग पूल और शॉपिग सेंटर और हर वो चीज बनाई जानी प्रस्तावित है, जिससे यह अद्भुत स्थलों में शुमार हो सके।
 

Tuesday, 8 April 2014

बेल का खेल


बेल का अजब खेल

बेल का पेड़ विश्व के कई हिस्सों में पाया जाता है। भारत में इस वृक्ष का पीपल, नीम, आम और पलाश वृक्षों के समान ही बहुत अधिक सम्मान है। हिंदू धर्म में बेल का वृक्ष भगवान शिव की अराधना का मुख्य अंग है। बेल की तासीर बहुत शीतल होती है। गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी होता है। इसके फल व पत्तियों मंे टैनिन, आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं।
मान्यता है कि शिव को बेल-पत्र चढ़ाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। बिल्व के पेड़ का भी विशिष्ट धार्मिक महत्व है। कहते हैं कि इस पेड़ को सींचने से सब तीर्थों का फल और शिवलोक की प्राप्ति होती है।
बेल का वृक्ष यूं तो पूरे भारत में पाया जाता है लेकिन विशेष रूप से हिमालय की तराई, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों में चार हजार फीट की ऊंचाई तक यह पाया जाता है। मध्य व दक्षिण भारत में बेल वृक्ष जंगल के रूप में फैले हुए हैं और बड़ी संख्या में उगते हैं। यह भारत के अलावा दक्षिणी नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया एवं थाईलैंड में उगते हैं। इसकी खेती भारत के साथ श्रीलंका, उत्तरी मलय प्रायद्बीप, जावा एवं फिलीपींस तथा फीजी द्बीपसमूह में भी की जाती है।
 
यह पंद्रह से तीस फुट ऊं चा होता है। इसका कड़ा और चिकना फल कवच कच्ची अवस्था में हरे रंग और पकने पर सुनहरे पीले रंग का हो जाता है। कवच तोड़ने पर पीले रंग का सुगंधित मीठा गूदा निकलता है, जो खाने और शर्बत बनाने के काम आता है।

आयुर्वेद में बेल वृक्ष को कई प्रकार से लाभकारी बताया गया है। इसके पत्तों, फलों को औषधि के रूप में बहुत प्रयोग किया जाता है। बेल की जड़ों की छाल का काढ़ा मलेरिया व अन्य बुखारों में हितकर होता है। अजीर्ण में बेल की पत्तियों का रस काली मिर्च और सेंधा नमक में मिलाकर पीने से आराम मिलता है। अतिसार के पतले दस्तों में ठंडे पानी से इसका चूर्ण लेने पर आराम होता है। आंखें दुखने पर बेल के पत्तों का रस, स्वच्छ पतले वस्त्र से छानकर एक-दो बूंद आंखों में टपकाने से समस्या से निजात मिलती है। शरीर की त्वचा के जलने पर बेल के चूर्ण को गरम कर तेल में मिलाकर जले अंग पर लगाने से आराम मिलता है।
 

Sunday, 6 April 2014

कंकालों का घर

कंकालों का घर रूपकुंड झील

आप एडवेंचर ट्रैकिग के शौकीन है तो रूपकुंड झील आपके लिए एक बेहतरीन जगह है। रूपकुंड झील हिमालय के ग्लेशियरों के गर्मियों में पिघलने से उत्तराखंड के पहाड़ों में बनने वाली छोटी सी झील है।
यह झील 5०29 मीटर की ऊंचाई पर स्तिथ है, जिसके चारों और ऊंचे-ऊंचे बर्फ के ग्लेशियर हैं। यहां तक पहंुचने का रास्ता बेहद दुर्गम है इसलिए यह जगह एडवेंचर ट्रैकिग करने वालों की पसंदीदा है। यह झील यहां पर मिलने वाले नरकंकालों के कारण काफी चर्चित है। यहां पर गर्मियों में बर्फ पिघलने के साथ ही कहीं पर भी नरकंकाल दिखाई देना आम बात है। यहां तक कि झील के अंदर देखने पर भी तलहटी में भी नरकंकाल पड़े दिखाई दे जाते हैं। यहां पर सबसे पहला नरकंकाल 1942 में रेंजर एच.के. मड़वाल द्बारा खोजा गया था। तब से अब तक यहां पर सैकड़ों नरकंकाल मिल चुके हैं। जिसमंे हर उम्र व लिग के कंकाल शामिल हैं। यहां पर नेशनल जियोग्राफिक टीम द्बारा भी एक अभियान चलाया गया था जिसमे उन्हें 3० से ज्यादा नरकंकाल मिले थे।
इस जगह पर इतने सारे नरकंकाल आए कैसे? इसके बारे में अलग-अलग कहानियां प्रचलित हैं। 1942 में हुए एक रिसर्च से हड्डियों के इस राज पर थोड़ी रोशनी पड़ सकती है। रिसर्च के अनुसार ट्रैकर्स का एक ग्रुप यहां हुई ओलावृष्टि में फंस गया जिसमें सभी की अचानक और दर्दनाक मौत हो गई। हड्डियों के एक्सरे और अन्य टेस्ट में पाया गया कि हड्डियों में दरारें पड़ी हुई थीं जिससे पता चलता है कि कम से कम क्रिकेट की बॉल की साइज के बराबर ओले रहे होंगे। वहां कम से कम 35 किमी. तक कोई गांव नहीं था और सिर छुपाने की कोई जगह भी नहीं थी। आंकड़ों के आधार पर माना जा सकता है कि यह घटना 85० ईसवीं के आस पास की रही होगी।
एक दूसरी किंवदंती के मुताबिक तिब्बत में 1841 में हुए युद्ध के दौरान सैनिकों का एक समूह इस मुश्किल रास्ते से गुजर रहा था। लेकिन वे रास्ता भटक गए और खो गए और कभी मिले नहीं। हालांकि यह एक फिल्मी प्लॉट जैसा लगता है पर यहां मिलने वाली हड्डियों के बारे में यह कथा भी खूब प्रचलित है।
अगर स्थानीय लोगों के मानंे तो उनके अनुसार एक बार राजा 'जसधावल’ नंदा देवी की तीर्थ यात्रा पर निकला। उसको संतान की प्राप्ति होने वाली थी इसलिए वह देवी के दर्शन करना चाहता था। स्थानीय पंडितों ने राजा को इतने भव्य समारोह के साथ देवी दर्शन जाने को मना किया। जैसा कि तय था इस तरह के जोर-शोर और दिखावे वाले समारोह से देवी नाराज हो गईं और सबको मौत के घाट उतार दिया। राजा, उसकी रानी और आने वाली संतान को सभी के साथ खत्म कर दिया गया। मिले अवशेषों में कुछ चूड़ियां और अन्य गहने मिले जिससे पता चलता है कि समूह में महिलाएं भी मौजूद थीं। तो अगर आप सुपरनेचुरल और देवी-देवताओं में विश्वास करते हैं तो इस कहानी को मान सकते हैं। अपने साथ किसी स्थानीय व्यक्ति को ले जाइए और रात के समय यह कहानी उनसे सुनिए। आपके रोंगटे जरूर खड़े हो जाएंगे।


Friday, 4 April 2014

बहुत हो गई बेपरवाही


लाइफ का फंडा तो बदलना पड़ेगा बॉस


एक बिदास और स्मार्ट युवा लाइफ का यही फंडा है। खाओ, पियो और मौज करो। लेकिन जब इसी उम्र में चर्बी चढ़ने लगती है। सेक्सुअल डिसीज के आँकड़े बढ़ने लगते हैं और जब टेंशन के मारे युवा नशे के शिकार होने लगते हैं, तो फिक्र होना लाजिमी है। सो, बी केयरफुल, हेल्थ इज वेल्थ या यूं कहें कि जियो जी भर के मगर सलीके से।
ऐसा नहीं है कि यह उम्र लापरवाह होती है। अगर ऐसा होता तो सिक्स पैक एब और जीरो फिगर की चाह में युवा जिम में मशक्कत नहीं कर रहा होता। सभी युवाओं की इच्छा होती है वह सुंदर दिखें, सेहतमंद रहें लेकिन साथ ही उत्साह, जोश और मस्ती भी तो इसी उम्र का असर है। वह कहां-कहां से बचें और कितना बचें? उम्र की सारी खुशियां बटोरते हुए भी हेल्थ और ब्यूटी पाई जा सकती है। बस इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

 

लाइफ को समझें

युवाओं को पेरेंटस का रोकना-टोकना बुरा लगता है। लेकिन थोड़ा सा समझें कि वे इस उम्र से गुजर चुके हैं और उन्हें हमसे ज्यादा दुनियादारी का तजुर्बा है। ठीक है, उनका जमाना और था, हमारा जमाना और है। पर सेहत की बात तो हर वक्त उतनी ही सही और सटीक होती है, जितनी हमारे शरीर के लिए जरूरी है। हमें उनका कहा बुरा लगता है तो खुद सोचें कि क्या हम यूँ ही इस दुनिया से चले जाएँगे बिना अपने सपनों को साकार किए? नहीं ना? तो फिर सुबह जल्दी उठनाए मॉîनग वॉक पर जाना, जिम जाना या जंक फूड न खाना जैसी बातें हमें बुरी क्यों लगती हैं?
अगर हमें सपने पूरे करने हैं तो लंबे समय तक जीना होगा और जीने के लिए हेल्दी रहना होगा और हेल्दी रहने के लिए बस इन्हीं छोटी-छोटी बातों का पालन करना होगा। समझ गए ना ? तो जियो जी भर के मगर सही तरीके और सलीके से। अगर आपको पेरेंटस की रोक-टोक पसंद नहीं तो अपने नियम खुद बना लें आखिर सेहत भी तो आपकी है।

खुद करें चुनाव

यंगएज में उतावलापन, गुस्सा, तनाव, जोश सभी में नजर आता है। लेकिन हमें यह तय करना है कि हमें इतना गुस्सा क्यों आता है, किस बात पर आता है और किस पर सबसे ज्यादा आता है ? जब इनके जवाब खोज लें तो फिर यह तय करें कि आपके मन पर कौन राज करता है?
इसे कुछ यूँ समझें कि अगर कोई व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति आपको गुस्सा दिला रही है तो इसका मतलब है अपने मन पर आपने किसी और को डॉमेनेट करने की परमीशन दे रखी है। वो जब चाहे आपको गुस्सा दिला देता है। किस बात पर कितना गुस्सा करना है, यह कोई और नहीं, बल्कि आप खुद तय करें। अपने मन के राजा आप खुद बनें। इससे कम से कम दस बीमारियों से आप दूर रहेंगे। ऐसा मेडिकल साइंस कहता है।

टाइम-टेबल फिक्स करें

खाना, नहाना और सोना अगर जीवन में सिर्फ इन तीन बातों का भी आपने समय डिसाइड कर लिया तो समझो आपकी आधी लाइफ सुधर गई। समय पर खाने से शरीर का मेटॉबॉलिज्म सुधरता है। समय पर नहाने से शरीर का एक सही चक्र बनता है, जो सारे दिन फ्रेशनेश देता है। समय पर सोने से ब्रेन एक्टिव और हेल्दी रहता है। ब्रेन को पर्याप्त आराम मिलेगा तो आपकी डिसीजन मैकिग पॉवर स्ट्रांग होगी। अच्छी नींद, अच्छा खाना और अच्छे से नहाना ये बस सेहत के लिए ही नहीं सुंदरता के लिए भी जरूरी है।

गलतियों से बचें

इस दुनिया में ऐसा कोई नहीं जिससे गलतियाँ नहीं होतीं। लेकिन एक ही गलती को बार-बार करना गलत है और इससे भी ज्यादा गलत एक गलती को उम्र भर के लिए अपराध मान लेना है। हर समय पश्चाताप की आग में जलना सही नहीं है, जिस दिन आपको यह एहसास हो कि आप गलत थे, बस वही दिन आपका नया दिन है।
पुरानी सब बातों, गलतियों और भूलों के लिए खुद को माफ करो। कहते हैं, जो एक बार गिरता है, वह संभल कर चलना सीख जाता है। इसलिए सब बातों पर धूल-मिट्टी डालो और आगे बढ़ जाओ। दुनिया आपको आपकी गलतियों के लिए माफ करे ना करे। आप खुद को माफ करें और जरूरत पड़ने पर खुद को ही सजा भी दें। लेकिन खुद पर दया न करें न ही खुद पर अत्याचार करें। यह दोनों बातें ही हेल्थ को नुकसान पहुँचाती हैं।

Monday, 31 March 2014

कल्पवृक्ष....

आदिवासियों का कल्पवृक्ष

साल वृक्ष एक अर्ध-पर्णपाती और कई सालों तक जीवित रहने वाला वृक्ष है। इस वृक्ष की उपयोगिता प्रमुख रूप से इसकी लकड़ियां हैं, जो अपनी मजबूती के लिए प्रसिद्ध हैं। साल वृक्ष के बीज, जो वर्षा के आरंभ काल में पक जाते हैं। कहा जाता है कि पूर्व समय में अकाल पड़ने पर आदिवासी इसी वृक्ष के फल खाकर जीवित रहते थ्ो। विशेषकर अकाल के समय अनेक जगहों पर भोजन के रूप में काम आते थे। इसीलिए आदिवासियों के लिए यह वृक्ष किसी 'कल्प वृक्ष’ से कम नहीं माना जाता। यूं तो इसका फल ही इतना मीठा होता है कि चीनी खाने के समान स्वाद मालूम होता है वहीं इसकी टहनी से निकलने वाले रस से प्यास भी बुझाने के काम आता है।
यह वृक्ष भारत के कई हिस्सों में पाया जाता है। भारत, बर्मा तथा श्रीलंका में इसकी कुल मिलाकर नौ प्रजातियां हैं, जिनमें 'शोरिया रोबस्टा’ प्रमुख है। हिमालय की तलहटी से लेकर तीन से चार हजार फुट की ऊंचाई तक और उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार तथा असम के जंगलों में यह प्रमुखता से उगता है। इस वृक्ष का विशेष और मुख्य लक्षण यह है कि ये अपने आपको विभिन्न प्राकृतिक मौसमों के अनुकूल बना लेता है।
 
भरी गर्मी में घने जंगलों में जब कंठ सूखने लगे और पीने का पानी न हो तो साल वृक्ष की टहनी से बूंद-बूंद टपकने वाले रस को दोने में एकत्र कर ग्रामीण अपनी प्यास बुझा लेते हैं। यह परंपरागत तरीका वर्षों से आदिवासी अपनाए हुए हैं। जंगलों में कोसा, सालबीज, धूप, तेंदूपत्ता आदि के संग्रह के लिए पहुंचने वाले ग्रामीण आमतौर पर पानी साथ लेकर नहीं जाते। ये लोग जंगल में पहुंचते ही साल वृक्ष के पत्ते का दोना तैयार करते हैं। इसके बाद पत्तों से लदी साल की टहनी काटकर उल्टा लटका देते हैं। कटी हुई टहनी का रस बूंद-बूंद टपकता है, जिससे दोना भर जाता है और ग्रामीण अपनी प्यास बुझा लेते हैं। इसीलिए साल वृक्ष के रस का उपयोग सदियों से किया जा रहा है। साल वृक्ष मानव के लिए बहुत ही लाभदायक है, इससे प्राप्त पत्ते, फल, लकड़ी, धूप, दातून यहां तक पानी भी संग्रहित किया जाता है।
 
साल वृक्षों की जड़ों के आस-पास कई तरह की सब्जियां पनप जाती हैं। जिसमें मशरूम प्रमुख है। साल वृक्ष के पत्तों से दोने में उतरा रस एक प्रकार से पूर्ण भोजन है, जिसे शर्करा भोजन कहा जा सकता है। इसमें प्रोटीन को छोड़ कर शेष सभी तत्व होते हैं। यह रस जमीन से वृक्ष द्बारा तत्व युक्त जल है। इसके सेवन से शरीर को तरलता मिलती है। कोई हानि नहीं होती है।